1 जन॰ 2018

नंदन, 2018 का जनवरी child story,nandan

ऊंची नहीं फेंकता ऊँट


-मनोहर चमोली ‘मनु’


एक ऊँट था। उसकी पीठ कुछ ज्यादा ही ऊंची थी। यही कारण था कि वह ऊंची-ऊंची फेंकता।
एक दिन वह टहलने निकला। नदी किनारे चूहा, गिलहरी, बंदर और खरगोश किसी बात पर हंस रहे थे। ऊँट भी जोर-जोर से हंसने लगा।
खरगोश ने पूछा-‘‘ऊँट भाई। तुम क्यों हंसे?’’

ऊँट बोला-‘‘तुम्हें देखकर हंस रहा हूं। मेरे सामने तुम सब कुछ नहीं।’’ 
चूहे ने पूछा-‘‘मतलब क्या है तुम्हारा?’’

ऊँट गरदन झटकते हुए बोला-‘‘मतलब ये कि मेरा एक दिन का राशन-पानी तुम सबके लिए महीने भर का होता है। जहां तक तुम देख सकते हो, वहां तक तो मेरी गर्दन ही चली जाती है। मैं रेगिस्तान का जहाज हूं। मैं वहां आसानी से दौड़ सकता हूँ। बिना रुके और बिना थके। तुम वहां चार कदम चलोगे तो हांफने लगोगे। समझे!’’
यह सुनकर गिलहरी हंसने लगी। चूहा, खरगोश और बंदर भी हंस पड़े। ऊँट पैर पटकते हुए बोला-‘‘तुम क्यों हंसे?’’
गिलहरी हंसते हुए ही बोली-‘‘ऊँट भाई। माना कि तुम बहुत बड़े हो। लेकिन कोई बड़ा एक छोटा सा काम भी कर सके, यह जरूरी नहीं।’’
ऊँट कुछ समझ न पाया। बोला-‘‘मैं बच्चों के मुंह नहीं लगता।’’
बंदर भी हंसते हुए बोला-‘‘ऊँट भाई। नाराज़ क्यों होते हो?’’
ऊँट ने बंदर से कहा-‘‘ये सब पिद्दी भर के हैं। इनसे मैं क्या बात करूं ! तुम सामने आओ। तुम ही बोलो। ऐसा कौन सा काम है जो तुम कर सकते हो और मैं नहीं? हां, पेड़ पर चढ़ने के लिए मत कहना। बोलो।’’
गिलहरी उछलकर बंदर के कान के पास जा पहुंची। दूसरे ही पल बंदर दौड़कर कहीं चला गया। वह पीठ पर एक तरबूज ला रहा था। उसने तरबूज ऊँट के सामने रख दिया।
बंदर ऊँट से बोला-‘‘ये लो। तुम्हें मेरी तरह इस तरबूज को अपनी पीठ पर ढोकर लाना है। उठाओ। बीस कदम ही सही, जरा चलकर तो दिखाओ। मगर ध्यान रहे ! तरबूज लुढ़कना नहीं चाहिए।’’
ऊँट बेचारा सकपका गया। भला वह पहाड़ जैसी तिकोनी पीठ पर गोल मटोल तरबूज कैसे रख पाता! तरबूज को पीठ पर रखकर चलना तो और भी मुश्किल काम था। ऊँट खिसियाता हुआ वहां से खिसक लिया।
तभी से ऊँट अब ऊँची-ऊँची नहीं फेंकता। 
०००

नंदन, साल 2018 का जनवरी अंक प्रकाशित हो गया है। अंक में प्रख्यात कवि शादाब आलम और रावेंद्रकुमार ‘रवि’ की कविताएं हैं। इस अंक में कथाकार रामशंकर अग्निहोत्री, अभिषेक मेहरोत्रा, योगेश्वर शर्मा, प्रो० योगेश चंद्र शर्मा, पूनम मेहता, रोचिका शर्मा, डॉ० अमिता भटनागर जैन, रेनू सैनी, विज्ञान भूषण, राजशेखर, आशा शर्मा, वेद मित्र, उदभ्रांत, रश्मिशील के साथ अपन की भी कहानी प्रकाशित हुई है। नए साल पर थीम स्टोरी सुनीता तिवारी ‘निगम’ और विमल चतुर्वेदी की हैं। नियमित स्तंभ तो हमेशा की तरह हैं ही। सुविधा के लिए अपनी कहानी यहाँ दे रहा हूँ। 
-मनोहर चमोली ‘मनु’, गुरु भवन, निकट डिप्टी धारा, पोस्ट बॉक्स-23, पौड़ी 246001 मोबाइल-09412158688.

second doon literature festival 2017 दून लिटरेचर फेस्टिवल

इस साल के खाते में यादगार रहा दून लिटरेचर फेस्टिवल 2017 

-मनोहर चमोली

देहरादून में तीन दिवसीय दूसरा ‘दून लिटरेचर फेस्टिवल’ साल 2017 के हिस्से में हिन्दी साहित्य की दृष्टि से अनमोल धरोहर के तौर पर कई विमर्श यादगार के तौर पर दे गया। तीसरे दिन की सुबह तलक पंजीकरण पंजिका में 440 साहित्यकार,पाठक और संस्कृतिकर्मियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कर ली थी। समय साक्ष्य व अर्श का यह आयोजन सामूहिकता के बैनर तले ध्यान मसीही केन्द्र,पुराना राजपुर,देहरादून में 24 दिसम्बर को सम्पन्न हुआ। मजेदार बात यह रही कि इन तीन दिनों में साहित्यिक विमर्श के साथ-साथ पुस्तक मेला भी तीनों दिन जमा रहा। हस्तशिल्प बाजार, लेखन कार्यशाला के साथ ऐपण कार्यशाला भी चलती रहीं। वहीं परिसर में फोटो प्रदर्शनी के साथ पेंटिंग प्रदर्शनी भी तीनों दिन अपनी उपस्थिति बनाए रही। दून लाइब्रेरी, अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन और मीडिया जैसी संस्थाओं ने आयोजन को प्रायोजित किया। 
पहला दिन :
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पहले दिन बच्चों के माध्यम से हवा में गुब्बारे उड़ाकर आयोजन की शुरूआत की गई। स्वागत सत्र भी बेहद शानदार रहा। सत्र का करीने से संचालन मोना बाली जी ने किया। स्वागत सत्र का औपचारिक संबोधन बी०के०जोशी, वीरेन्द्र रावत, एस०फारूख और लीलाधर जगूड़ी ने किया। शिक्षा और विज्ञान के जानकार बी०के०जोशी जी ने अपनी बात की शुरूआत हिन्दी साहित्य लेखन से की। उन्होंने कहा कि साल भर में कई ऐसे आयोजन होते हैं जिनमें अंग्रेजी साहित्य और अंग्रेजियत पर बात होती है। यह साहित्य समागम विशुद्ध रूप से हिन्दी साहित्य पर केन्द्रित है। यह बड़ी बात है। उन्होंने देहरादून को साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों का गढ़ कहा। उन्होंने कहा कि साहित्य और कला पर भी कई आयोजन होते हैं बस संगीत पर अभी हमें और ध्यान देने की जरूरत होगी। उन्होंने जोड़ा कि किसी भी शहर की असलियत और पहचान उस शहर में शिक्षा, साहित्य,कला और सांस्कृतिक गतिविधियों से बनती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इन तीन दिनों में सार्थक चर्चाएं होंगी जो हिन्दी लेखन में मील का पत्थर साबित होंगी।
इसी सत्र को संबोधित करते हुए निजी शिक्षा में पुस्तकालयों के काम को देख रहे वीरेन्द्र रावत ने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र से हूं और एक पाठक हूं। विज्ञान शिक्षा के लिए भी कला है। कला सुकून देती है। हमारे मानवीय संवेगों से साहित्य का रिश्ता है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी स्कूल सरकार के लिए नागरिक तैयार करते हैं और निजी स्कूल देश के लिए नागरिक तैयार करते हैं। उनका यह वक्तव्य देर शाम तक चर्चा का विषय बना रहा। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी स्कूल में सबसे कम उपयोग में लाने वाली जगह लाइब्रेरी है।

इसी सत्र को हिमालयन ड्रग्स के एस० फारूख ने संबोधित करते हुए पाठकों, श्रोताओं, अभिभावको, शिक्षकों, बच्चों को संबोधित करते हुए बहुआयामी दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि भाषा कोई भी हो बस बातचीत में खुशबू हो। नफरत न हो। दूसरी भाषा का अनुवाद करना बड़ी बात है। वह भी वही सलीका वही ध्येय दूसरी भाषा में हू-ब-हू चला जाए तो इससे बड़ा काम क्या हो सकता है। उन्होंने कहा कि जानवरों की जीभ होती है ज़बान नहीं। हम मनुष्य को प्रकृति ने ज़बान बख्शी है। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में जानवर जीभ से व्यवहार करते हैं इसलिए उनकी ध्वनि एक सी है। लेकिन हम मनुष्यों को देखिए हमारी जबान में कितनी विविधता है। हम अपनी जबान से सुकून पहुंचा सकते हैं। सुकून ए दिन इस दुनिया में वरना कौन बेचता है। उन्होंने कहा कि इसी ज़बान के जरिए साहित्य हमें आनंद देता है। कोई भी साहित्य, किसी भी भाषा का किसी भी देश का हो वह बुराई नहीं देता। साहित्य ही है जो इंसान से इंसान को मुहब्बत करना सिखाता है। इस अवसर पर स्टीव ऑल्टर ने भी सभी का धन्यवाद दिया।
इसी सत्र को लीलाधर जगूड़ी ने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा हमारा देश मेलों का देश है। आज मेलों का स्वरूप बदल गया है। पुस्तक मेले और ऐसे आयोजन भी मेलों के नए रूप हैं। उन्होंने मनुष्य और मनुष्यता पर विस्तार से अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि लेखक भी मनुष्य होते हैं। मनुष्य के तौर पर उनमें भी उत्कृष्टताएं और निकृष्टताएं पाई जाती हैं। कितनी विचित्र बात है कि धरती की पपड़ी जो बेहद कठोर होती है एक नन्हा-सा बीज धरती की परत को फाड़कर बाहर आने का साहस करता है। उन्होंने भारतीय प्राचीन साहित्यकारों का उल्लेख भी किया। भामाह, वराह से लेकर तुलसीदास के व्यक्तित्व और कृतित्व पर दृष्टि डाली। उन्होंने कहा कि अक्षर ही हैं जिनका पतन नहीं होता, क्षरण नहीं होता। एक-एक वर्ण जुटते हैं। फिर शब्द बनते हैं। फिर वाक्य बनते हैं। शब्द और वाक्य सामर्थ्य देते हैं। ताकत देते हैं। साहित्य अभिव्यक्ति का सशक्त स्वरूप है।
पहले दिन का पहला सत्र भी बेहद उपयोगी रहा।
‘भारत : सांस्कृतिक विविधता के संदर्भ में’ के लिए दो घण्टे भी कम पड़ गए। संचालन पल्लव जी का रहा। ज्ञानेन्द्र पाण्डे जी ने कहा कि भारत में दो बड़े आन्दोलन से हम अपनी सांस्कृतिक विविधता को समझ सकते हैं। भक्ति का आन्दोलन और आजादी का आन्दोलन। वैसे क्षेत्रीय आंदोलन तो अनेक हुए हैं। लेकिन व्यापक फलक पर भारतीयों का समागम इन दो आन्दोलनों में खूब दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि हर देश काल में राजा की प्रंशसा से इतर भी साहित्य रचा गया है। हमें इस विविधता को समझना होगा। हमारे यहां जितनी विभिन्नताएं हैं वही हमे वैविध्य से भरा देश बनाता है। यही विविधता हमारा सौन्दर्य है।
इसी सत्र को रंग एवं संस्कृतिकर्मी हम्माद फारुखी ने भी संबोधित किया। उन्होंने भारतीयता और सास्कृतिक विविधता में खाना पर अपनी बात फोकस की। उन्होंने कहा कि यह दौर क्रूरता और हिंसा का दौर है। लेकिन नासमझों को कहां पता कि हमारा जो कुछ हम समझते हैं, हमारा हैं कहा। मिर्च, आलू से लेकर चीनी भी हमारी कहां हैं! ये जो बेगानापन समझने का दौर है, इसे समझना होगा। उन्होंने खाना और जनानखाना से अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि ज़बान का ताल्लुक हमारी भाषा से है और हमारी भाषा में जो हमें अपनत्व दिखाई देता है उसमें बहुत कुछ साझा है। उन्होंने कहा कि भारता मेरी अस्मिता है। मेरा गौरव है। यह अहसास मुझसे कोई नहीं छीन सकता। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत दक्षिण एशिया का हिस्सा है। दक्षिण एशिया भी किसी ओर का हिस्सा है। समूची दुनिया भी किसी न किसी का हिस्सा है।
हम्माद फारूखी जी ने कहा कि समझ में नहीं आता ये हिन्दू थाली का कंसेप्ट कहां से आ गया? अगर हम अपने घरों की भोजन की थाली देंखे तो उसमें से अधिकतर चीज़ें आयातित हैं। कहीं भी किसी की भी थाली हो। फिर ये खाने में अपना-बेगाना कहां से आ गया। खाना किसी धर्म-जाति और सम्प्रदाय से जोड़कर क्यों देखा जाने लगा है। क्यों पड़ोसी की रसोई की तलाशी जा रही है। यह सब क्या है? हमें समझना होगा कि सोलहवीं सदी में और उससे पहले भी जाएं तो रानियों ने अपने मायके का जनानखाना, वहां के स्वाद और खाने की रेसिपी अपने ससुराल तक कैसे पहुंचाई। इसी तरह राजे-रजवाड़ों से भी हमारा भोजन यहां-वहां फैला। लेकिन मैं यह कहने लगूं कि मेरा स्वाद श्रेष्ठ है तो यह गलत है। हम अपने को समृद्ध करें और दूसरे के स्वाद का भी सम्मान करें। उन्होंने कहा कि खाना हमारी सांस्कृतिक विविधता को बढ़ाने का कारगर नुस्खा रहा है। इस में महिलाओं का खा़सकर जनानखाने का योगदान भुलाया नहीं जा सकता।
इस सत्र को शेखर पाठक जी ने भी संबोधित किया। उन्होंने अपनी बात में भक्ति आंदोलन और खान-पान को जोड़ते हुए कहा कि भारत की सांस्कृतिक विविधता पर बात करना बड़ी बात है। शेखर पाठक जी ने एक किताब का उल्लेख किया कि आदिवासी नहीं नाचेंगे। ये कौन तय कर रहा है कि हमें क्या करना है और क्या नहीं। उन्होंने कहा कि हम सभी को विविधताओं का सम्मान करना सीखना होगा। उन्होंने कहा कि इस समय सच बोलने का जोखिम उठाने वालों का साथ देना भी बडी बात है। उन्होने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विविधता पर सोचते हुए ही पता चलता है कि हम कितना कम जानते हैं। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड को ही हम कितना जान पाए हैं। हिमालय की सांस्कृतिक विविधता के बारे में हमें कितना पता है! हम अपने जिले या पड़ोसी जिले को ही कितना जानते हैं। हमें यह भी जानना चाहिए कि निर्णायक लोग कितना जानते हैं।
उन्होंने कहा कि ऊपर से कुछ नहीं आता। मिट्टी से हम उठते हैं। मिट्टी ही हमें उठाती है। मिट्टी से ही किसी संस्कृति का परिचय होता है। यह सही है कि भूगोल मनुष्य को प्रभावित करता है। हम यदि हिमालयी क्षेत्र की ही बात करें तो बेहद विविधताएं हैं। भिन्नताएं हैं। समाज में पशुचारकों, खेतीहरों, मनुष्यों की बोली, खान-पान में ही ज़िन्दगी एक जैसी नहीं है। हिमालय दुनया का सबसे विविधता से भरा क्षेत्र है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति इतनी विशिष्ट है कि इसका अध्ययन करने पर आनंद की अनुभूति होती है। लेकिन जो संस्कृति के संवाहक बने फिरते हैं, वे कितना कम जानते हैं। हिमालयी पर्वतीय संस्कृति का क्षेत्र ही विहंगम है। हिमालयी ़़क्षेत्र में हिन्दू धर्म भी है तो बौद्ध धर्म भी है। जैन धर्म भी है और इस्लाम भी। सूफी भी है तो कट्टर इस्लाम भी है। इस पूरे ़़क्षेत्र में वे भी हैं जो किसी धर्म को नहीं मानते। तिब्बती भी है तो नेपाली भी हैं इसाई भी हैं। बुद्धिज़्म भी है तो देवियों की जबरदस्त परम्परा भी है। लोक देवियां भी हैं। इस पूरे क्षेत्र में शिव केवल हिन्दुओं मात्र के नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र ऐसा है कि यहां ब्रहमा,विष्णु और महेश के बिना संस्कृति चल सकती है लेकिन लोक देवता के बिना नहीं। पूरे हिमालय ़क्षेत्र में समृद्ध वीर गाथाएं हैं। लोक नायकों की समृद्ध परम्परा हैं। कोल वंश हैं तो वैष्णव भी हैं तो यहां नागाज़ भी हैं। हिमालय में आज भी 600 भाषाएं बोली जाती हैं। यह कहना भी जरूरी होगा कि भाषा मात्र शब्द नहीं हैं। चित्र और पुरातत्व भी भाषा है। हिमालयी संस्कृति के पैरोकार भी आम आदमी थे। पण्डित नैन सिंह रावत की 150 साल पहले की डायरी हमें चौंकाती है कि हमारी यात्रांए कितनी अधूरी हैं। अमरनाथ की यात्रा खोजने वाला इस्लामी था।
कैलाश मानसरोवर की यात्रा कराने वाले कौन हैं? हेमकुण्ड साहिब, रीठा, नानकमत्ता की यात्राएं हमारी सांस्कृतिक विविधता की मिसाले हैं। हमारी साझा विरासत ही हमारा गौरव है। हम साहित्य में तो 2000 साल से ही आए हैं। हमारी श्रुत परंपरा 5000 साल पुरानी है। आज यह हमारे लिए गौरव की बात है कि हमारे हिमालयी लोग 33 भाषाओं में लिख रहे हैं। हिमालयी परम्पराएं सदियों की समझ है। समझ थी। लेकिन आज स्थिति उलट है। हिमालय का अशांत करने पर तुले हुए हैं हम। हमारी मूर्खता है कि हम अपने पुरखों की समझ को नहीं समझ रहे। हम अब हिमालय की यात्रा सर्दियों में भी करेंगे। आल वैदर रोड इसका उदाहरण है। हिमालय को आराम नहीं देंगे। हम कब समझेंगे कि हिमालयी क्षेत्र की संपदा को फलने-फूलने का समय दिया जाता रहा है। अब हम वहां बारह महीने जाएंगे तो कैसे हमारी धरोहरें बचेंगी? गणेश देबी जी ने श्रोताओं को लगातार सबोधित किया और श्रोता भी थे एकाग्र होकर इस सत्र को सुनते रहे।
पहले दिन का दूसरा सत्र एक घण्टे का रहा। रोहित जोशी के संयोजन में इस सत्र के लिए दो वक्ता मंच पर आसीन थे। प्रियदर्शन और मनीषा पाण्डे। ‘सोशल मीडिया के दौर में‘ प्रियदर्शन ने बहुआयामी अनुभव श्रोताओं के समक्ष रखे। यह सत्र सवाल जवाब के तौर भी काफी कारगर रहा। प्रियदर्शन जी ने कहा कि समय के साथ-साथ हमारे संवाद भी बदले हैं। हम सब जानते हैं कि हमारी वाचिक परंपरा सदियों तक जिन्दा रही। वह सुनने के कौशल को बनाए हुए थी। सुनकर जानकारियों को हस्तांतरित किया जाता था। तब वाचिक परंपरा का अपना महत्व था। जैसे ही छापाखाना आया। सब बदल गया। जो अनुभव सुने जाते थे। सुनाए जाते थे। वे छापेखाने के बाद किताबों में आ गए। लिखित शब्दों की दुनिया अनोखा अनुभव रहा होगा। अब इंटरनेट आ गया। इंटरनेट ने हाथ से लिखने की निर्भरता पर प्रभाव डाला है। इंटरनेट के जितने माध्यम हैं। इसके दोनों परिणाम हमारे सामने हैं। सोशल मीडिया ने रिश्तों को डिजीटल ढंग से देखना शुरू कर दिया है। बीते समय में लैंगिक विषमता चरम पर थी। फेसबुक ने इसे तोड़ा है।
इसी सत्र में एक सवाल के जवाब में मनीषा जी ने कहा कि आज फेसबुक,व्हाट्स एप और टिवट्र के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। आज नेतागण भी इसके महत्व को समझने लगे हैं। यह तकनीक बेहद कारगर भी सिद्ध हुई है। आज महिलाओं के पास अपनी अभिव्यक्ति का सरल,सहज और सुगम साधन है। वह अपनी टाइमलाईन की मालिक हैं। पहले संपादक हुआ करते थे। उनकी अपनी अहमियत थी। आज हर कोई अपनी वॉल का राजा है। जिस विचार में ताकत होगी वह पहुंचेगा। आगे जाएगा। गूगल में तथ्य ही तथ्य हैं। भरे पड़े हैं। सूचना की तेजी इस कदर बड़ी है कि एक क्लिक पर सारी दुनिया की जानकारी आपके सामने हैं।
एक सवाल के जवाब में प्रियदर्शन ने कहा कि हम पत्रकारिता के उस दौर को भी देख चुके हैं जब देश-विदेश की सूचनाएं दूर बैठे संवाददाता के फोन पर फैक्स पर तार पर निर्भर थी। फिर मेल आया। आज तो पूरी दुनिया में जो कुछ घट रहा है लाइव आपके सामने आपके मोबाइल पर है। सूचना आई और गई। आया-गया। आया-गया भी हो रहा है। सुबह खोलिए कोई चीज़ तेजी से ट्रैण्ड कर रही होती है। देखते ही देखते हजारों लाखों में ट्रैण्ड कर रही होती है। कुछ ही घण्टों में कोई दूसरी घटना लाखों में ट्रैण्ड कर रही होती है। सूचनाओं की और समाचारों की अब लम्बी उग्र नहीं है। इस तेजी के बुरे परिणाम भी है। प्रियदर्शन ने कहा कि जब आप जंगल में सैर कर रहे होते हैं तब स्थिति दूसरी होती है। लेकिन जब आप उसी जंगल में अपनी जान बचाने के लिए दौड़ रहे होते हैं तब स्थिति दूसरी होती है। उन्होंने कहा कि स्मृति हमारे अनुभव से आती है। तेजी से बढती घटनाओं और एक के बाद एक सूचनाओं ने हमारी स्मृति और अनुभवों को पीछे धकेल दिया है। जब अनुभव ही नहीं हो रहा है तो स्मृति बनेगी कैसे? आज हमारा मिज़ाज सैलानी हो गया है। आज के सैलानी भी क्या गजब करते हैं। नैनीताल और मसूरी पहुंचते ही झट से क्लिक करते हैं। सेल्फी लेते हैं और फेसबुक में शेयर करते हैं। हो गया। अनुभव किया नहीं। यात्रा को शहर के मिज़ाज को महसूस किया नही ंतो स्मृति में रहेगा क्या! हमारी रचनात्मकता भाप की तरह उड़ रही है। खतरे पर बात करें तो पिछले दो-चार सालों के चुनाव देख लें। सूचना तकनीक के नए इस्तेमालों का जमकर दुरुपयोग हुआ। यकीन करना मुश्किल है कि सच से अधिक झूठ ज्यादा चला। ऐसा नहीं है कि पहले ऐसा नहीं होता रहा होगा। लेकिन यहां झूठ इतनी तेजी से फैलता है कि पूछो मत।
एक सवाल के जवाब में मनीषा जी ने कहा कि माध्यम बदला है। ये ट्रैण्ड का दौर है। हम जो सोचते हैं कि इसे ट्रैण्ड नहीं करना चाहिए वहीं टै्रण्ड करने लगता है। इंटरनेट कौड़ियों का मीडिया बन गया है। मानीवय दखल कम हुआ है तो पसंद और नापसंद को आकलित नहीं कर सकते। यह सत्र मीडिया के स्वभाव और उसके बनते-बिगड़ते स्वरूप को समझने के लिए कारगर रहा। इस सत्र में श्रोताओं के पास कई सवाल थे लेकिन समयाभाव के चलते इस सत्र को भी समय के खाके में समेटना पड़ा।
भोजनोपरांत तीसरा सत्र दो घण्टे का रहा। ‘हिन्दी साहित्य में गाँव’ के इस सत्र का संयोजन युवा लेखक खेमकरण सोमन ने किया। पंकज बिष्ट, शिवमूर्ति, और कुशल कोठियाल ने समाज,साहित्य और वर्तमान परिदृश्य के साथ बीते कई दशकों के गांवों के हालात भी श्रोताओं के समक्ष रख दिए। यह सत्र भी बेहद शानदार रहा। युवा कथाकार दिनेश कर्नाटक ने दर्जनों कहानियों का उल्लेख उनके रचनाकारों के साथ गांव के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया। हिन्दी साहित्य में गांव और गांव की खूबी,संस्कृति और गांव के लोकजीवन के कहानियों के बरअक्स उन्होंने प्रभावी ढंग से श्रोताओं के समझ रखा।
इस सत्र में बटरोही जी ने भी उत्तराखण्ड के साहित्यकारों की रचनाओं में गांव किस तरह प्रतिबिम्बित होता है, सधे हुए अंदाज में खोलकर रख दिया। बटरोही जी ने सवाल किया कि आज जब गांव ही नहीं रहेंगे तो साहित्य में गांव कैसे आएगा? उन्होंने कहा कि हिन्दी साहित्य विशाल है। हम कहानियों का चुनाव कर गांव को अच्छी तरह विश्लेषित नहीं कर सकते। चुनाव के आधार पर विश्लेषण नहीं हो सकता। उन्होंने उत्तराखण्ड के उन लेखकों का उल्लेख किया जिनके साहित्य में और जिनके लेखन में गांव आया। गोविन्द वल्लभ पन्त, रमा प्रसाद घिल्डियाल, इलाचन्द जोशी, का उल्लेख उन्होंने किया लेकिन उन्होंने पहला ग्रामीण जनजीवन साहित्य में लाने वाले शैलेश मटियानी जी को श्रेय दिया। उन्होंने विद्यासागर नौटियाल, जगदीश चन्द्र पाण्डेय,राधाकृष्ण कुकरेती का उल्लेख ग्रामीण जीवन के श्रेष्ठ उत्तराखण्ड के कहानीकारों में शामिल किया। उन्होंने हिमांशु पाण्डे और शेखर जोशी को शहरी जीवन के कहानीकार बताया। पंकज बिष्ट, क्षितिज शर्मा, गोपाल उपाध्याय, नवीन कुमार नैथानी, मोहन थपलियाल, मुकेश नौटियाल,अनिल कार्की की रचनाधर्मिता को गहरे से उठाया।
पहले दिन के अंतिम सत्र भी बेमिसाल रहा। रंगू सरोया से संवाद का संयोजन उमेश ध्यानी जी ने किया। लड़कियों का अपहरण और उन्हें रेड लाईट एरिया में पहुंचाने वाले गिरोहर के साथ उनका संघर्ष दिल को दहलाने वाला था। अपने अनुभव बताते हुए रंगू बोलीं कि वे और उनकी टीम अब तक 400 लड़कियों को रेड लाईट एरिया से हटा चुकी है। वे बोलीं कि ह्यूमन टै्रफिक में कई समस्याएं हैं। लड़कियां इसमें कई तरह से फंस जाती हैं। गरीबी, लाचारी, भूखमरी और अच्छे रोजगार के झांसे में आने से भी यह कारोबार फल-फूल रहा है। समाज की नियति भी लड़कियों को यहां से बाहर निकालने में दिक्कते पैदा करती हैं। कंचनजंघा उद्धार केन्द्र के हवाले से रंगू सरोया ने एक घण्टे के अपने संबोधन में आंखों देखे अनुभव सुनाए। वे बोलीं कि पश्चिम बंगाल मानव तस्करी का सबसे बड़ा बाज़ार है। उन्होंने कहा कि समाज स्वस्थ कैसे बनेगा? यह हम सभी को सोचना होगा।
पहले दिन विद्यासागर नौटियाल की कहानी पर आधारित एकल नाट्य मंचन फट जा पंचधार ने मन मोह लिया। कुसुम पंत का अभिनय शानदार रहा। संभव मंच परिवार की यह प्रस्तुति और अभिषेक मैन्दोला के कुशल निर्देशन यादगार बन पड़ा। देर शाम अमित सागर की टीम की सांस्कृतिक प्रस्तुति भी यादगार रही। इस सत्र का संयोजन नंद किशोर हटवाल ने किया। 
दूसरा दिन:
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दून लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन का पहला सत्र भी यादगार बन पड़ा। महात्मा गांधी और हमारा समय सत्र का संयोजन विजू नेगी ने किया। इस सत्र में वक्ता के तौर पर राधा भट्ट, नचिकेता और अनिल जोशी रहे।

दूसरे दिन का दूसरा सत्र कश्मीर और कश्मीरियत बेहद प्रभावी रहा। कश्मीर से आए निद़ा नवाज़ ने कश्मीर और कश्मीर के लोगों के बहाने वहां के हालातों का असरदार चित्रण अपने व्याख्यान में किया।
निदा नवाज़ जी ने कहा कि कश्मीर समस्या को वहां के हालातों,राजनीति और नेताओं ने अति संवेदनशील बना दिया है। यदि हम 13वी सदी में कशमीर का अध्ययन करें तो हालात ऐसे न थे। उन्होंने कहा कि धारा 370 की वजह से पाकिस्तान समर्थकों को कश्मीर के हालातों को और दुश्वार बनाने का मौका मिला। अलगाववादियों को मौका मिला। यह सब 370 के गलत प्रचार से हुआ। आज तक एक भी चुनाव कशमीर का नहीं सम्पन्न हुआ है जो सही तरीके से किया गया हो। धर्म और राजनीति की दो बन्दूकें हैं जिनके बीच कशमीर तड़प रहा है।
धर्म और राजनीति की दुकानों के बीच आम आदमी पिसा जा रहा है। कश्मीरियत गंगा-जमुनी की संस्कृति रही है और है भी। निदा जी ने कहा कि जो हालाता देश के हैं कम से कम कशमीर इससे बेहतर है। उन्होंने बार-बार कहा कि वहां साम्प्रदायिकता का माहौल नहीं है। वहां आतकवादियों और सेना के बीच संघर्ष जरूर है। आज भी वहां 5500 कशमीरी हिंदु रहते हैं। बीते दस बरस में एक भी हिन्दू पीटा तक नहीं गया है।
आज भी लाखों लोग हैं जो पूरे भारत से हैं और कशमीर में रह रहे हैं। हर घर में तीन से चार लोग कशमीर से बाहर के हैं जो आज वहां रह रहे हैं। वहां कोई नहीं पूछता किसी से कि आपका धर्म क्या है? आप कहां के रहने वाले हैं? वहां राजनीति है। आतंकवाद है पर सांप्रदायिकता नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि 2010 तक कशमीर में 47000 लोग मारे गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में मात्र 219 हैं जो हिन्दू पण्डित थे, जो मारे गए। कश्मीर सियाशत और धर्म की भट्टी में जल जरूर रहा है। निदा ने साफ कहा कि कोई भी नहीं चाहता कि कशमीर समस्या हल हो। न दिल्ली न इस्लामाबाद। सबके अपने अपने स्वार्थ हैं।
चीन अधिकृत कशमीर, भारत अधिकृत कशमीर और पाकिस्तान अधिकृत कशमीर। कशमीरी तीना भागो में बंटा हुआ है। दूसरी बात पूरी दुनिया में कशमीरी जहां भी रह रहे हैं। जहां भी पढ़ रहे हैं उन पर हमले हो रहे हैं। यह किससे छिपा है। क्यों? इसका जवाब किसी के पास नहीं है। कट्टरवाद के सामने कोई तर्क नहीं चलता। यह बात सही है कि वहां सम्पत्ति बहुतों ने अर्जित की है। वह सब अनाधिकृत तौर पर अर्जित की है। अब तक कशमीर में 60000 लोग मारे जा चुके हैं। 30000 वहां मिलिटेंट हैं। धर्म के नाम को यूज़ किया जाता रहा है।
सड़क से लेकर संसद तक ड्रामेबाजी हो रही है। कश्मीर में लोग मुस्कराना भूल चुके हैं। वहां के लोगों के चेहरे पत्थर के हो गए हैं। भावना शून्य चेहरे लिए घूमते हैं। 90 फीसदी महिलाएं तनावग्रस्त हैं। 70 फीसदी पुरुष तनावग्रस्त है। अपराध कश्मीर में सबसे कम है। आज भी कश्मीरियों में बहुत कुछ अच्छाईयां बची हुई हैं। वह मज़हबी नहीं है। साम्प्रदायिक नहीं है। कौन लोगों को मिलिटेंट बनाता है, यह सब जानते हैं।
तीसरा सत्र सिनेमा और समाज पर रहा। अविनाश दास और विभावरी ने इस सत्र में अपने विचार व्यक्त किये। इस सत्र का संयोजन भास्कर उप्रेती ने किया। तीसरा सत्र सिनेमा और समाज पर रहा। अविनाश दास और विभावरी ने इस सत्र में अपने विचार व्यक्त किये। इस सत्र का संयोजन भास्कर उप्रेती ने किया। भास्कर उप्रेती जी ने सिनेमा के कल और आज पर चर्चा करते हुए विमर्श के संकेत दिए। सिनेमा को किस तरह से देखा जाए? उन्होंने जोड़ा कि क्या मात्र मनोरंजन और पूंजी के तौर पर ही सिनेमा को देखने की जरूरत है या इसके कुछ और भी मायने हैं? उन्होंने नायक-नायिका के तौर पर और समाज के सन्दर्भ के तौर पर सिनेमा के इतिहास और वर्तमान पहलूओं को रेखांकित किया। विभावरी जी ने कहा कि सिनेमा मात्र सिनेमा नहीं है वह कला है। ऐसी कला है जिसके मायने समाज से सीधे जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि हर कला को समाज से जुड़ना भी चाहिए। सिनेमा पर भी समाज की जिम्मेदारी है। आज तो यह जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है जब अभिव्यक्ति पर ही सवाल उठने लगे हैं। यह कहना गलत न होगा कि सिनेमा मनोरंजन का जरिया है। यहां बेशुमार पूंजी भी लगती है यह भी सही है। एक सौ बीस साल के छोटे से इतिहास में सिनेमा ने बहुत खास काम किए हैं। विभावरी जी ने कहा कि जब-जब सिनेमा ने समाज को साथ लेकर फिल्में की हैं वे फिल्में बेहतर सिनेमा के तौर पर गिनी गईं। उन्होंने मुक्तिबोध के हवाले से कहा कि समाज की चेतना को विकसित करने का काम भी कलाओं को करना चाहिए।
अविनाश जी ने एक सवाल के जवाब में कहा कि समाज में एक साथ कई गतिविधियां संचालित होती हैं। इस गतिविधियों को कहने के लिए कई विधाएं हैं। साहित्य है, सिनेमा है और ललित कलाएं हैं। हां हमें अपने इलाके की गतिविधियों की कहानी कहनी चाहिए। सिनेमा कला है पर आज उससे अधिक वह बाजार हो गया है। बाजार में तकनीक है। उत्पादन है। यह सिनेमा जो एक समाज का रूप ले चुका है वह आज पैसे पर टिका हुआ है। वैसे हर सिनेमा का अपना संघर्ष होता है। आज सिनेमा में हम अपनी कहानियां बेचते हैं। अगर बाजारवाद का पहलू देंखे तो हम फिल्म नहीं बनाते फिल्म हमें बनाती है। यह फिल्म ही तो हैं जो हमें बाजार में बनाए रखती है। समाज में बनाए रखती है। उन्होंने कहा कि फिल्मी दुनिया के लोगों को भी समझ, बेचैनी और अभिमुखीकरण बचाए और बनाए रखता है।
विवादों को आमंत्रित करना भी क्या एक एलीमेन्ट है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि बाजार के जो कायदे हैं, रणनीति है वह सिनेमा में भी काम करती है। श्रोताओं में भूपेन जी ने भी सवाल उठाया। उन्होंने सिनेमा को आधुनिक कला बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि सिनेमा एक माध्यम है जो हमारी अस्मिताओं का उभार है। लेकिन आज सिनेमा में कब्जा किसका है? किसी एक ताकतवर का उभार खतरनाक नहीं?
श्रोताओं की ओर से प्रियदर्शन भी मंच पर आए। उन्होंने कहा कि कोई भी क्षेत्र है। वहां सियाशी फिज़ा आती है। फिल्में अछूती कैसे रह सकती हैं। विभावरी जी ने कहा कि प्रयोगधर्मिता वहां पहले भी थी और आज भी है। तीस के दशक की फिल्मों में और आज की फिल्मों में कई प्रयोग हमारे सामने हैं। आज का सिनेमा बदला है।
अविनाश जी ने कहा कि आज सिनेमा बदला है। लेकिन यह भी सच है कि बिना पूंजी के सिनेमा नहीं चलेगा। प्रतिरोध का सिनेमा आज भी है। कल भी था। लेकिन आज बहुत अच्छी फिल्में सामूहिकता के प्रयास से बन रही हैं। उन्होंने तुरुप फिल्म का उदाहरण दिया। सिनेमा के सिद्धहस्तों ने मिलकर जो जिस क्षेत्र का है उस क्षेत्र का योगदान कर सामूहिकता की मिसाल पेश की। मराठी की विलेज रोक स्टार का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि आज साहित्य से जितनी चेतना जगाते हैं। सिनेमा एक फिल्म से कई गुना चेतना जगाने का काम करता है। यह बात स्वीकार करनी होगी। सिनेमा ने हमारे रंग-ढंग जीवन शैली को नहीं बदला? सिनेमा एक तरह से विशालतम साहित्य है। सिनेमा औजार है। अब इन औजारों का प्रयोग कैसे होता है, यह ओर बात है।
एक सवाल के जवाब में वक्ता इस बात पर सहमत थे कि अभिव्यक्ति की आजादी सभी को है। आलोचना की आजादी भी है। अच्छी बुरी दोनों तरह की फिल्में दर्शकों के विवेक पर छोड़ी जाती है। ऐसा नहीं है कि सार्थक फिल्मों की चर्चा नहीं होती। क्लासिक फिल्में ही चर्चाओं में रहती हैं। ये ओर बात है कि कौन सी फिल्म कितनी चली और कितनी नहीं। फिल्म कैसी बननी चाहिए ये निर्माताओं पर छोड़ना ही होगा। लोगों पर भरोसा करना होगा। क्या इंटरनेट पर पोर्न फिल्में नहीं हैं। सेंसर करने की कितनी कोशिशें कीं। क्या हुआ?
फिल्मों पर चर्चा करते हुए प्रियदर्शन जी ने कहा कि आज समाज में स्वीकारोक्ति बढ़ी है। हिंस बड़े पैमाने पर बड़ी हैं। फिल्मों में पहले ऐसा नहीं था। कई चीज़ें परदे पर दूसरी तरह से बढ़ी हैं। हिंसा और अपराध फिल्मों में सामाजिक मजबूरी की तरह दिखाई देती है। ये सिनेमा में विकृत तौर पर दिखाया जा रहा है। लेकिन यह भी सच है कि फिल्मों ने सामाजिक सद्भाव भी समाज को दिए हैं। आज की नायिका बदली है। समाज भी बदला है। हम साहित्य और समाज को अलग नहीं कर सकते। सिनेमा ने हमारे पूरे समाज को दृष्टि भी दी है। यह भी सच है। हम बहुत कुछ असल में बाद में देखते हैं सिनेमा हमें पहले दिखाता है। कुल मिलाकर सिनेमा के बहाने समाज, साहित्य और सरोकारों पर खास बातें सुनने को मिली। यह सत्र भी कई घण्टे का विमर्श चाहता था। एक घण्टे का विमर्श बेहद सार्थक रहा।
चौथा सत्र लोक साहित्य और शिक्षा पर रहा। यह सत्र और भी समय की दरकार रख रहा था। अमरेन्द्र त्रिपाठी, दिवा भटट, सुभाष कुशवाहा, मदन मोहन पाण्डे, हजारीमयुम रिपुप्यारी ने सार्थक चर्चा श्रोताओं के समक्ष की। सार्थक संयोजन प्रियंवद का रहा।
दूसरे दिन शाम का सत्र पलायन एवं चिंतन के नाम रहा। प्रदीप टमटा, रतन सिंह असवाल के बहाने सुभाष तराण ने श्रोताओं के समक्ष शानदार चिंतन प्रस्तुत किया। देर शाम कवि सम्मेलन भी आयोजित किया गया। सुमन केशरी, हुसैन हैदरी, मदन मोहन डुकलाण सहित कई प्रतिष्ठित कवियों को मंच प्रदान किया हेमन्त बिष्ट ने।
तीसरा दिन :
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देहरादून में आयोजित दूसरे दून लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन के पहले सत्र में ‘बाल साहित्य : शैक्षिक उपक्रम‘ के वक्ताओं ने बाल साहित्य में हर विषय को शामिल करने की पुरजोर वकालत की। वक्ताओं ने असरदार ढंग से तर्कसंगत उदाहरण देते हुए जोर दिया कि आज के बाल साहित्य को पंचतंत्र श्रृंखला से मुक्त होने की आवश्यकता है।
भोपाल से आए बाल विज्ञान मासिक पत्रिका और नन्हे-मुन्नों की लोकप्रिय दुमाही पत्रिका प्लूटो के संपादक सुशील शुक्ल जी ने कहा कि शैक्षिक उपक्रम और आनंद के साथ बाल साहित्य की बात करना उन्हें सुखद लग रहा है। आनंद का फलक विस्तार लिए हुए है। आज इस आनंद पर बात करते समय यह देखना होगा कि आनन्द का स्रोत है क्या! ‘मंदिर वहीं बनेगा’ जैसे वाक्य में वहीं शब्द कईयों के लिए आनंद हो सकता है।
लम्बे समय से बाल विमर्श पर अध्ययन-मनन-चिंतन और लेखन कर रहे सुशील शुक्ल जी ने कहा मशहूर किताब ‘तोत्तो चान‘, प्रेमचन्द की कहानी ‘ईदगाह‘ और ‘अनारको के आठ दिन‘ को अपनी बातचीत का हिस्सा रखा।
सुशील शुक्ल जी ने कहा कि तोत्तोचान में लड़की के आनंद को देखें तो यह दिलचस्प है। उसके स्कूल में जो डेस्क है और घर में है, दोनों में एक अन्तर है। स्कूल का डेस्क ऊपर की ओर खुलता है। उसे उसको खोलने में बड़ा आनंद आता है। वह कक्षा में बार-बार उसे खोलती है और बंद करती है। इस खोलने और बंद करने के उसके पास कारण है। वह किताब निकालती है। कॉपी निकालती है। कभी पेंसिल के बहाने तो कभी किसी ओर चीज़ को निकालने के बहाने उसे खोलती है। अध्यापक को इसमें उसके आनंद के क्षण नहीं दिखाई देते। वहीं लड़की उस ढक्कन को हजार बार खोलती है। हज़ार बार खोलने में खुद से सीखने या कर गुजरने के अहसास हैं।
सुशील शुक्ल जी ने कहा कि वे बाल साहित्य में आनंद को अनारकों के आठ दिन से कुछ उदाहरण के साथ आपके सामने रखना चाहेंगे। उन्होंने कहा कि अनारको एक लड़की है। सुशील शुक्ल जी ने कहा कि आज अनारको का मूड खराब है। सुबह-सुबह माँ ने उसे बिस्तर से उठा दिया और कहा कि ये लोटा ले और मंदिर में ठाकुर जी को जल चढ़ा आ। अनारको ने पूछा कि ठाकुर जी को जल क्यों चढ़ाएँ? तो माँ ने कहा ठाकुर जी को जल चढ़ाने से वह खुश होते हैं। अनारको ने पूछा कि ठाकुर जी को खुश क्यो करना? तो माँ ने जरा जोर से कहा कि ये भी कोई पूछने की बात हुई? चल उठ और मंदिर जा। आगे अनारको पूछती है कि ठाकुर जी मंदिर में ही क्यों रहते हैं? तो माँ ने जवाब दिया कि वह तो कहीं भी रहते हैं। तो अनारको ने कहा कि फिर मैं लोटे का पानी बाहर भिंडी के पौधों में डाल आऊँ?
सुशील शुक्ल जी ने अनारको के आठ दिन से एक दूसरा अनुच्छेद पढ़कर सुनाया। उन्होंने बताया कि एक बार प्रधानमंत्री उस शहर में आ रहे थे। चारों ओर चर्चा थी। 
सुबह की बात है। अनारको को मालूम था, नाश्ता करते वक्त पापा का मूड जरा अच्छा रहता है। सो वह बिस्तर से उठकर पापा के पास जाकर बैठ गई। ‘‘पापा प्रधानमंत्री क्यों आ रहे हैं?’’ अनारको ने पूछा। पापा ने कहा,‘‘पुल का उदघाटन करने आ रहे हैं।’’ ’’उदघाटन क्या होता है पापा? क्या पुल प्रधानमंत्री ने बनाया है?’’
नहीं बेटी,तूने देखा तो है,पुल मजदूरों ने बनाया है , लोगो ने बनाया है।’’
‘‘तो फिर प्रधानमंत्री क्यों आ रहे है उद्घाटन करने?’’
उन्होंने कहा,‘‘वो देश के प्रधानमंत्री हैं!’’
‘‘पुल बनाने के पत्थर कहां से आते हैं पापा? प्रधानमंत्री ने क्या पुल बनाने के लिए पत्थर दिए हैं?’’
‘‘बेटी, पत्थर पहाड़ों से आते हैं, उनको लोग काट-काटकर निकालते हैं।’’
अनारको ने आगे पूछा,‘‘फिर प्रधानमंत्री क्या पैसा देते हैं? प्रधानमंत्री के पास पैसे कहां से आते है?’’ 
पापा ने कहा,‘‘पैसे लोगों से आते हैं। लोग देते हैं सरकार को पैसे।’’ अबकी बार अनारको ने ज़रा जोर से पूछा,‘‘अच्छा लोग पुल बनाते हैं, पत्थर पहाड़ से आते है और पैसे भी लोग देते हैं,फिर पुल का उदघाटन करने प्रधानमंत्री क्यों आ रहे हैं?’’

एक अनुच्छेद सुशील जी ने और पढ़कर सुनाया। अनारको स्कूल में थी। मास्साब ने पूछा-‘‘अच्छा बताओ, आज कौन आ रहे हैं अपने यहाँ? बस अनारको खड़ी हो गई और पूछा,‘‘मास्साब,प्रधानमंत्री कौन होते हैं?’’ मास्साब अकड़-रो गए,‘‘तुम प्रधानमंत्री नहीं जानती? देश के प्रधानमंत्री! अच्छा चलो बताओ,हमारे देश के प्रधानमंत्री का नाम क्या है?’’ नाम तो अनारको जानती थी लेकिन बताया नहीं। बदले में उसने पूछा,‘‘मास्साब प्रधानमंत्री को मेरा नाम पता है?’’ इस पर तो मास्साब की अकड़ ही कम हो गई और चकरा भी गए। फिर कहा,‘‘प्रधानमंत्री को और कोई काम नहीं कि तुम्हारा नाम याद करते फिरें . . .चलो बैठ जाओ।’’
सुशील शुक्ल जी ने कहा कि हमारी पाठ्य पुस्तकों में भी जो बातें हैं। किस्से हैं, कहानियां हैं उन्हें दूसरी तरह से देखा-पढ़ा जाता है। ईदगाह को देखें तो उस कहानी की जो शुरूआत है। सुबह है। दिन की शुरूआत है। क्या वह कक्षा-कक्ष में वैसे पढ़ाई जाती है? कहानी में जो संदर्भ हैं। क्या बच्चे वे समझ पाते हैं? ये चिन्ता है। सुशील जी ने कहा कि जैसे हमारे सामने ही कोई पेड़ है। इस पेड़ को देखना क्या हुआ? पेड़ को देखना, समझना तो एक सिलसिला है। किसी चीज़ को समझने का जो सिलसिला है, वह महत्वपूर्ण है। पेड़ क्या है। उसकी शाखें क्या हैं? पत्ते कैसे हैं। उस पेड़ पर कौन-कौन से पक्षी आते हैं। वह हर मौसम में कैसा रहता है। पेड़ की जड़ें और भी बहुत कुछ है। अब बच्चे पेड़ को देखने का कोई तो सिलसिला कहीं से तो शुरू करेंगे। ये समझ का सिलसिला है।
सुशील जी ने कहा कि ऐसा कोई मुद्दा क्यों छूटे? हर इश्यू पर बाल साहित्य क्यों न हो? आज भी कई ऐसे इश्यू हैं जिन्हें बाल साहित्य से दूर रखा जाता है। बाल साहित्य में कई ऐसे विषय हैं जिन पर आपको एक भी कहानी नहीं मिलेगी। बार-बार और हर बार बीस से तीस ऐसे विषय हैं जो सालों से रिपीट होते चले आ रहे हैं। हमें समझना होगा कि बच्चों के लिए हर विषय जरूरी है। बच्चों पर यकीन करना होगा। बच्चों के साथ झुकना होगा। कब तक सतही सामग्री बाल साहित्य के नाम पर परोसी जाएगी। अब जैसे मृत्यु है। मृत्यु पर बच्चों पर कोई कहानी शायद ही मिले।
सुशील जी ने कहा कि बच्चों के मन में भी गंभीर सवाल हैं। हम ऐसे मसलो पर बात क्यों नहीं करना चाहते। लड़ाई-झगड़े, उनके सपने, उनके द्वंद, उनकी मुश्किलें क्या इनकी जगह हमारे साहित्य में है? उन्होंने कहा कि बच्चे जानते हैं कि बड़े क्या चाहते हैं? बड़े क्या सोचते हैं? सुशील जी ने कहा कि हम बच्चों को पढ़ने की सामग्री में शैक्षिक किस्म ही क्यों ढूंढते हैं? कौन सी ऐसी चीज़ें हैं जिनसे आंनद नहीं मिलता।
रचनात्मकता नहीं जगती तो फिर बच्चें कैसे शामिल होंगे? उन्होंने कहा कि बांग्ला और मराठी की तरह हिंदी में बालपन की गहराई साहित्य में उतनी नहीं दिखाई देती। बच्चों के साथ बड़ों का तर्कसंगत व्यवहार बहुधा साहित्य में दिखाई नहीं देता। उन्होंने सुकुमार राय, सुनील गंगोपाध्याय का उल्लेख भी किया। जीवन से जुड़ा साहित्य हो, यह बहुत जरूरी है। हमने हर साहित्य में शिक्षा को बहुत ज़्यादा तरजीह दे रखी है। बच्चों के साथ भी ऐसा ही है। कुछ भी देखेंगे तो हम खोजने लगेंगे कि इससे बच्चा सीख क्या जाएगा। हमारा तीव्र आग्रह साहित्य में अभी भी बना हुआ है। हम साहित्य में निचोड़ देखने लगते हैं। निष्कर्ष पर हमारा जोर रहता है। शिक्षा में भी ऐसा ही है। हम उद्देश्य और शिक्षा खोजने लगते हैं। इससे न पाठ की यात्रा होती है और न ही साहित्य की।
सुशील जी ने कहा कि बाल साहित्य भी आज भी पंचतंत्र से मुक्त नहीं हो पाया। हम कब समझेंगे कि हर बात पशु-पक्षियों के माध्यम से ही क्यों कहनी है? दूसरी बात यह कि उनके माध्यम से कुछ भी कह दो। वह भी जो पशु-पक्षियों का व्यवहार ही नहीं है। आदत नहीं है। स्वभाव ही नहीं है। कुछ सीखाना है तो कहानी गढ़ दो। कोई नज़रिया देना हो तो कहानी लिख दो। दृष्टिकोण और मूल्यों के लिए कहानी कह दो। हमें समझना होगा कि हम इंसानी पात्रों की कहानी क्यों न लिखें? बच्चों के आस-पास की कहानी क्यों न लिखें।
उन्होंने कहा कि नजरिया भी बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बहेलिये वाली कहानी का उदाहरण दिया। एक बहेलिया जो दिन भर की मशक्कत के बाद पक्षियों को जाल में पकड़ता है। एक चूहा जाल को काट देता है। हमें इस कहानी में बहेलिये का संदर्भ भी समझना होगा। पक्षियों का भी और चूहे का भी। इस लिहाज से हर बार कहानी के मायने खास हो जाएंगे।
गुल्लक के संपादक रहे और शिक्षाविदों के साथ लंबे समय तक कार्य कर चुके बाल साहित्य के अध्येता गुरबचन सिंह जी ने कहा कि आज बच्चों के संदर्भ में विषय भविष्य का नहीं आज का मसला है। बच्चों का कल तो बाद की बात है उनका आज का बचपन नष्ट हो रहा है। साहित्य और बाल साहित्य को समझने के लिए बच्चे को समझना होगा।
अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय बंगलुरू के भाषा,अनुवाद और प्रकाशन से जुड़े गुरबचन सिंह जी ने कहा कि आज बच्चों के समर्थन में हम सभी को आगे आना होगा। उन्होंने एक प्रसंग सुनाया कि एक बच्ची के लिए छतरी का बार-बार खुलना रोचक अनुभव से कम नहीं है। मारिया मान्टेसरी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बच्ची को बार-बार छतरी बंद कर के दी जा रही है और वह बच्ची बार-बार उस छतरी को खोल रही है। वह सौ बार खोलने के बाद भी संतुष्ट नहीं है। वह छतरी के खोले जाने और बंद करने की प्रक्रिया को खुद से समझना चाहती है। बच्चे किसी बात को, किसी प्रक्रिया को जानने-समझने के लिए भले ही हजार बार क्यों न प्रयास करे, वो करेंगे। समय कितना भी लगे। सीखने और समझने के लिए यह जरूरी भी तो है। रचनात्मकता और उदार आनंद बचपन की कुंजी है। खुशी तो डूबने जैसी है। यह जरूरी नहीं कि वह चेहरे पर दिखाई ही दे।
गुरबचन जी ने भी ईदगाह और तोत्तोचान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पाठ्यपुस्तकों के अपने ढांचे होते हैं। मूल ईदगाह कहानी से इतर पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाई जाने वाली ईदगाह गहरे संदर्भों की अनदेखी है। उन्होंने कहा कि साहित्य में वो भी बच्चों के साथ वर्जनाओं के मायने क्या हैं? क्यों हम बच्चों को यथार्थ से दूर ले जाना चाहते हैं? बच्चे के दृष्टिकोण को और उनकी रचनात्मकता को समझने की जरूरत है। एक स्कूल में गुलजार जी के गीत का उल्लेख उद्घोषिका कर रही थीं-‘‘जंगल-जंगल बात चली है पता चला है। टणटणटण टणा टणा टणा टणा है.....।
ये देखिए। मतलब कि हम बड़ों में वयस्कता के मसले इस कदर भरे पड़े हैं कि बच्चों की सृजनशीलता को देख ही नहीं पा रहे हैं। आदर्श की अतिरंजनाएं इतनी भरी पड़ी हैं कि बच्चे को अबोध मानने की परिपाटी छूटे नहीं छूट रही है। हम विवरण और कहानी का अंतर नहीं समझ पा रहे हैं। सूचनात्मक साहित्य भी जरूरी है पर उसमें आंनद की अनुभूति की बहुत अधिक संभावना नहीं रहती।
गुरबचन जी ने कहा कि बाल साहित्य का इतिहास देखें तो आजादी के बाद चार दशकों तक भी बाल साहित्य उपेक्षित रहा। 1986 की नई शिक्षा नीति और उसके बाद कहीं जाकर यह आदेशों में शामिल हुआ कि बच्चों तक बाल साहित्य पहुंचे। प्राइमरी, अपर प्राइमरी, माध्यमिक तक अलग-अलग तरह के पुस्तकालयों की बात हुई। लेकिन आज तक भी शिक्षा में बाल साहित्य एक पूरक सामग्री के तौर पर ही है। ऐसे कैसे बाल साहित्य के महत्व को जान-समझ सकेंगे। बाल साहित्य ही शिक्षा के काम को आगे बढ़ाता है। यदि बाल साहित्य को बढ़ावा मिले तो ही बच्चों का चहुर्मुखी विकास हो सकता है। बच्चे का भावनात्मक विकास बाल साहित्य से ही संभव है।
उन्होंने कहा कि हमें समझना होगा कि आज के बच्चे आक्रामक क्यों हो रहे हैं। वे संवेदनहीन क्यों हो रहे हैं? कहीं न कहीं उन्हें भावनात्मक और उनकी दुनिया का साहित्य नहीं मिल रहा। गंभीर साहित्य को पढने का आग्रह शून्य ही है। यही कारण है कि दुःख,मृत्यु अवसाद जैसे विषय बाल साहित्य में नहीं है। बच्चों के शुरूआती जीवन में मिलने वाला साहित्य बच्चों की समझ बढ़ाता है। हमें समझना होगा कि हम बच्चों को बहुसंस्कृति, बहुआयामी और विविधता से भरी संस्कृति,जीवन और प्रकृति से परिचित कराएं।
बाल साहित्य ऐसा संसार है जिसमें कुछ भी शामिल किया जा सकता है। शिक्षा इसमें बहुत बड़ा काम कर सकती है। बाल साहित्य बच्चों को तर्कशील समाज का हिस्सा बना सकता है। शिक्षकों से बात करते हैं तो एक अकेली पाठ्यपुस्तक से भला वे भी कितना कुछ कर सकते हैं?
ऐसे में बाल साहित्य आशा जगाता है। यदि वह वंचितों तक पहुंचे। पढ़ना वह भी अक्षरों और वणों, शब्दों तक सीमित रहे तो वह कोरा पढ़ना ही माना जाएगा। पढ़ने का अर्थ और अर्थ के साथ आनंद का भाव जगे तो बात बने। हमें समझना होगा कि बच्चे भाविष्य के गंभीर पाठक क्यों नहीं बन पाते। बाल साहित्य का उपयोग समझ और दक्षता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।
गुरबचन सिंह जी ने कहा कि इस दिशा में यशपाल समिति की सिफारिशें बेहद खास हैं। शिक्षा जगत में उन पर ध्यान दिया जाता तो बेहतर होता। उन्होंने जोर देकर कहा कि बाल साहित्य बचपन को पोषित करता है। ज्ञान के स्रोत भी साहित्य ही खोलता है। यह पाठ्यपुस्तकों में सीमित होता है।
उन्होंने कहा कि पाठों के तौर पर जो साहित्य आया भी है वह गतिविधियों के कर्मकाण्ड में उलझकर रह गया है। यदि पाठों में आए साहित्य की ताकत को समझा जाए और कक्षा-कक्ष में उनका समझ के साथ उपयोग किया जाए तो यह अपनी ताकत का अहसास भी कराता है।
गुरबचन सिंह जी ने साहित्य के लेखकीय, सामाजिक और बच्चे के दृष्टिकोण पर भी चर्चा की। अंत में कुछ श्रोताओं की ओर से कुछ सवाल भी पूछे गए। समय के अभाव में बारह बजे इस सत्र का समापन किया गया। यदि सत्र दस बजे आरंभ होता तो विमर्श की संभावनाएं और भी बढ़ जातीं। एक घण्टा दस मिनट चले इस सत्र में बाल साहित्य की मुश्किलें,संभावनाएं और शिक्षा से इसके सरोकारों को रेखांकित किया जाना सुखद रहा।
सत्र के संयोजक अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन से जुड़े शिक्षा, भाषा और साहित्य के अध्येता अशोक मिश्र रहे। उन्होंने डेढ़ घण्टे संचालित इस सत्र की शुरूआत ख़ास शेरों से की। जिनका सार यही था कि वे घर कहां अच्छे लगते हैं, जहां बच्चे नहीं होते। यह भी कि बच्चों के बारे में चिंता करने के लिए भी विमर्श को स्थान मिले तो अशोक मिश्र जी ने यह भी कहा कि हम अपने भविष्य के बारे में चिंता करने के लिए यहां जुटे हैं। उन्होंने बाल साहित्य की परिपाटी पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि ऐसे मौके प्रायः कम ही होते हैं जब बच्चों के बारे में बात होती है।
देहरादून में आयोजित दूसरे दून लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन के दूसरे सत्र में ‘शिक्षा और समाज‘ के वक्ताओं ने शिक्षा के सरोकार और समाज की प्रतिक्रिया की असरदार ढंग से समीक्षा की। वक्ताओं ने माना कि शिक्षा और समाज दोनों को बदलते हैं। आज भी सहभागी शिक्षा, सहज शिक्षा, सुलभ शिक्षा और सार्थक शिक्षा की आवश्यकता है। वक्ताओं ने कहा कि देखने दिखाने के दौर पर आज स्कूल का होना दिखना चाहिए। स्कूल का दिखाई देना नहीं स्कूल का होना जरूरी है।
अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन उत्तराखण्ड के राज्य प्रमुख कैलाश काण्डपाल जी ने कहा कि शिक्षा और समाज एक दूसरे के पूरक हैं। ये दोनों एक दूसरे को बदलते हैं। इन दोनों का आपस में घना रिश्ता है। हम सब जानते हैं कि व्यक्तियों का समूह जो आपसी संवाद करते हैं और कुछ सामान्य उद्देश्य के लिए एक-दूसरे के साथ रहते हैं। वह उद्देश्य उन्हें बांधे रखता है।
कैलाश जी ने कहा कि हम बात करते रहेंगे तो कई सवाल उठेंगे। कई परतें हैं जिन्हें खोलना होगा। मानव समाज को देखें तो हम खुद को कहां रखें। मैं अपनी ही बात करता हूं तो मैं समाज में मानव के तौर पर हूं। फिर मैं भारतीय हूँ। फिर और देखें तो मैं किस हिस्से का हिस्सा हूँ? मेरे अपने मायने क्या हैं? समाज,मनुष्य,भारतीयता, राज्य, जिला, धर्म, जाति फिर स्तर भी गिना जाता है। यही नहीं और घनी तथा गहरी परतें हैं। समाज में हम अपनी विरासत का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। विस्तार में जाएंगे तो फिर हमारे मूल्य हैं। मानव विकास की यात्रा मूल्यों तक पहुंची। समय लगा। शिक्षा को देखें तो वह मूल्यों की बात करती है। मूल्यों में बदलाव समाज में होते रहते हैं।
कैलाश काण्डपाल जी ने कहा कि समाज की विकास यात्रा में फिर संवैधानिक मूल्य हैं। इन्हें भी गहराई से समझना होगा। हमें समझना होगा कि हिंसा कैसे काम करती है। शक्ति है तो उसका दुरुपयोग दमन के लिए किया जाता है। शिक्षा हमारी समझ बढ़ाती है। यह शिक्षा और समाज का रिश्ता ऐसा है कि इसके कई आयाम हैं जिन पर विस्तार से बात की जा सकती है।
ख्यातिलब्ध संस्था सिद्ध के प्रमुख और सामाजिक एक्टीविस्ट पवन गुप्ता ने शिक्षा और समाज के रिश्ते को गांव,शहर,राज्य,देश और राष्ट्रों की संस्कृति के साथ जोड़ते हुए अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि हम ऐसे समाज का हिस्सा हैं जो असहज है। बोधशाला के अनुभवों को उन्होंने विस्तार से रखा।
पवन जी ने कहा कि आज भी अधिकतर स्कूल ऐसे प्रदर्शन का हिस्सा हैं जहां उनका जोर दिखना दिखाने पर रहता है। दरअसल स्कूल में होना दिखाई देना चाहिए न कि स्कूल का दिखाई देना। उन्होंने कहा कि मैं कैसा दिखता हूँ इस पर जोर है। जबकि मैं कैसा हूँ इस पर जोर होना चाहिए। ये जो स्मार्टनेस का मसला है इस पर विचार करने की जरूरत है।
विचारक,शिक्षाविद् एवं समाजशास्त्री प्रो०आनन्द कुमार जी ने कहा कि हमारा इतिहास जो भी रहा हो पर आज हम अपनी ऐतिहासिकता से ही त्रस्त हैं। ये समय आत्मग्लानि का समय है। आज का दौर ऐसा हो गया है कि सवाल पूछना ही साहस का काम है। हम उस दौर के हैं जब हमने आपातकाल का सामना किया। आपातकाल के पाखण्ड का सामना किया। प्रतिरोध किया। आज ऐसे गीत कम हो गए हैं। उन्होंने कहा कि आलोचना करने का विवेक जाग रहा है उसकी गति धीमी जरूर है। समीक्षा की जरूरत है। बड़े मामूली लोग बड़े सवाल करें तो जागरूक समाज माना जाए। आज ऐसा समय है कि कोई भी सवाल उठाते हैं तो दक्षिणपंथी सोच को हवा मिलती है। सतत् आंदोलन की प्रक्रिया हो।
प्रो० आनन्द कुमार जी ने कहा कि शिक्षा और समाज के बरअक्स देखें तो हम जितना जीते हैं उतना ही हारे हैं। बहुत जल्दी ही कस्तूरी रंगन कमेटी आने वाली है। उन्होंने कहा कि आज अंग्रेजी का आकर्षण बाजार का आकर्षण है। कृष्णमूर्ति जी के स्कूलों को समझने और जानने की जरूरत है। शिक्षा के मायने को हमें विद्यार्थी, शिक्षक और समाज के अंतरसंबंधों के ज़रिए समझना होगा।
प्रो०आनन्द कुमार जी ने कहा कि आज तो पेड़,धरती,मिट्टी और हवा ही लुटेरों के कब्जे में हैं। शिक्षा भी इस भयावह स्थिति से मुक्त नहीं है। सब जानते हैं कि हम मनुष्यों ने गंगा को कितने हद तक अपवित्र कर दिया है। फिर भी हम कहते हैं कि गंगा पवित्र है! यह कैसा समय है? हमें तीन स्थितियों को समझना होगा। समता बनाम सम्पन्नता, लोकतंत्र बनाम शक्तितंत्र और दिखावट बनाम बनावट। हम कब समझेंगे कि शिक्षा में बजट का छठा हिस्सा खर्च करो। हम सरकारों के खिलाफ इस नारे के साथ संघर्ष करते रहे हैं।
प्रो०आनन्द कुमार जी ने कहा कि आज स्थिति और भयावह हो गई है। बजट में मौजूदा सरकार मात्र 3.4 हिस्सा खर्च कर रही है। कैसे शिक्षा का सार्वत्रीकरण होगा? हम आज भी ऐसी मानकिसता में जी रहे हैं जहां शिक्षा को समाज की बेटी माना जाता है। वह तो समाज की बंधिनी है। बिना समाज के पूछे शिक्षा में बदलाव कैसे होगा? और समाज? समाज किस ओर जा रहा है? हमें शिक्षा के तीनों पक्षों को समझना होगा। इस पर सोचना होगा। शिक्षा का अर्थशास्त्र। शिक्षा की राजनीति। शिक्षा का समाज शास्त्र।
प्रो०आनन्द कुमार जी ने कहा कि हम सब जानते हैं कि शिक्षा का बाजारीकरण ने हमारे मन-मस्तिष्क में कैसी शिक्षा का ढांचा ला खड़ा कर दिया है। क्या स्त्रियां, क्या दलित और क्या अल्पसंख्यक। ब्राहम्ण-ठाकुर में बंटें है पर हम सब जानते हैं कि हम अपने बच्चों को अभिमन्यु बना रहे हैं। पता है कि इस तंत्र में वो मारा जाएगा। पर झोंक रहे हैं। यह जुड़ाव का समय नहीं बिखराव का समय है। बढ़ती भूख बिगड़ती भूख बन गई है। आकर्षण भी है तो असंतोष भी हैं प्रबल प्रतिरोध नहीं है। राजसत्ता को बाजार सत्ता संभाल रही है।
प्रो० आनन्द कुमार ने कहा कि जब तक हम समाज को सहभागी शिक्षा नहीं देंगे। सहज शिक्षा नहीं देंगे। सुलभ शिक्षा नहीं देंगे। सार्थक शिक्षा नहीं देंगे। समाज में ऐसे संघर्ष और उलझाव दिखाई देता रहेगा। हमें अपनी स्थिति से बाहर आना होगा। असहमति और सवाल उठाने के लायक खुद को बनाना ही होगा।
सत्र का संयोजन अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन से जुड़े नेतृत्वशील व्यक्तित्व जगमोहन कठैत जी ने किया। शिक्षा, सामाजिक सरोकारों के अध्येता और भाषा-साहित्य के जानकार जगमोहन कठैत जी ने सत्र को पांच खास सवालों के आस-पास रखा। दो घण्टे चले इस शानदार सत्र ने श्रोताओं को बांध कर रखने में सफलता हासिल की।
श्री जगमोहन ने सबसे पहले वक्ताओं का परिचय दिया। उन्होंने वक्ताओं से मुख़ातिब होते हुए जानना चाहा कि शिक्षा और समाज के रिश्ते को कैसे देखा जाए? उन्होंने जोड़ा कि वांछित समाज तक शिक्षा कैसे पहुंचाई जाए? आज भी गांव और अपनी जड़ों से निकलना और शहरों में काम करना सफलना का प्रतीक है। जो छात्र अपनी जड़ों में हैं। अच्छा कर रहे हैं उनके साथ समाज का रवैया कि ये कहीं निकल नहीं पाया! यही रह गया। इसे कैसे देखा जाए? श्री जगमोहन ने कहा कि शिक्षा के मकसद को कैसे देखें शिक्षा जोड़ने के लिए है या अपने क्षेत्र से निकलने के लिए है?
श्री जगमोहन ने अपने शिक्षा विमर्श को आगे बढ़ाते हुए जानना चाहा कि आज भी स्कूलों की स्थिति ऐसी क्यों है कि शिक्षक पूरे दिन भर बोलता रहता है और छात्र पूरे दिन पर सुनते रहते हैं। शिक्षा का ऐसा ढांचा किसने तय किया? उन्होंने कहा कि जिस विकास और प्रगति की बात हम कर रहे हैं उसे इस तरह कैसे देखें कि सुदूर गांव तक सड़क चली आई है। लेकिन वह गांव से शहर सब कुछ ले जा रही है। दूध,तरकारी,फल और बहुत कुछ और गांव में फास्ट फूड ला रही है। ये कैसी समझ है? कैसा विकास है? हम इस पूरे परिदृश्य में शिक्षा और समाज के रिश्ते को कैसे टटोलें?
तीसरे दिवस के तीसरे सत्र में जब महिलाएं लिखती हैं सत्र का संयोजन विद्या सिंह ने किया। इस सत्र में बेबी हाल्दार और सुमन केसरी ने अपने विचार व्यक्त किए।
पुस्तक विमोचन के बहाने फागूदास की डायरी पर भी बात हुई। संपादन लेखक प्रभात उप्रेती और वरिष्ठ कथाकार गुरदीप खुराना ने अपने विचार व्यक्त किए। संयोजन मनोहर चमोली का रहा। समापन पर आयोजकों की ओर से प्रवीण भट्ट और रानू ने आगन्तुकों का आभार प्रकट किया।
समय साक्ष्य व अर्श के तत्वाधान में आयोजित तीन दिवसीय दून साहित्य समागम पुराना राजपुर स्थित ध्यान मसीही केन्द्र, देहरादून में सम्पन्न हुआ। दून लाइब्रेरी,अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, मीडिया ने इसे प्रायोजित किया। समग्र ट्रस्ट,स्पैक्स, द हिमालय ट्रस्ट और चिट्ठी पत्री का विशेष सहयोग रहा। प्रचार समिति का संयोजन सुन्दर बिष्ट, गौरी सिंह और मोहित कुमार ने किया। प्रकाशन समिति का दायित्व सुशील उपाध्याय, नन्द किशोर हटवाल, प्रमोद भारतीय और सत्यानन्द बडोनी ने संभाला। मेहमानों की मेज़बानी भारती पाण्डे, सुरेन्द्र पुण्डीर, प्रहलाद रावत, आशीष सुन्द्रियाल, दिनेश कण्डवाल, प्रतिभा कटियार और रवि जीना ने संभाली। आयोजन समिति के बी०के०जोशी, एस०फारूख, योगेश भट्ट, गीता गैरोला, प्रवीन कुमार भट्ट, मदन मोहन डुकलान, बृज मोहन शर्मा,रानू बिष्ट, वन्दना वर्मा, निवेदिता शील, शेख अमीर अहमद और प्रेम पंचोली का योगदान अविस्मरणीय रहा।
बताते चलें कि दूसरा दून लिटरेचर फेस्टिवल इसलिए भी यादगार बन पड़ा कि पहले ही दिन से बच्चों के साथ साहित्यकारों ने कई सत्रों में विमर्श किया। उनकी सुनी और उन्हें अपने अनुभव सुनाए। स्वयं आयोजन में सहभागिता के साथ जिम्मेदारी वहन करने वाले नामचीनों में जितेन ठाकुर, राकेश रयाल, इन्द्रजीत सिंह, गिरीश सुन्द्रियाल, गजेन्द्र रौतेला, वन्दना वर्मा, मनमीत, राजेश पाल, बृजमोहन, मुकेश नौटियाल, भूपेन सिंह, दिनेश, धर्मेन्द्र नेगी, अनिल कार्की, सुभाष पंत, भारती पांडे, बसंती मठपाल, प्रीतम अपच्छयाण, दिनेश कंडवाल, मनोज इष्टवाल, मधूसूदन थपलियाल, दिनेश भट्ट, शिव प्रसाद सेमवाल का सहयोग देखते ही बनता था। ०००
-मनोहर चमोली 
सम्पर्क : 9412158688

13 नव॰ 2017

कविता: पढ़ना सीखना का सशक्त माध्यम

कविता: पढ़ना सीखना का सशक्त माध्यम 

-मनोहर चमोली ‘मनु’
                             
अभिभावकों के साथ अधिकतर शिक्षक भी कई बार पढ़ने से पहले लिखने पर जोर देते हैं। बुनियादी स्कूलांे की पहली कक्षा में ही बच्चों पर लिखने-लिखाने का दबाव दिखाई देता है। गृहकार्य में भी अक्सर बच्चों को लेखन कार्य दे दिया जाता है। यह अवधारणा ही गलत है। यही कारण है कि लिखना सभी दक्षताओं में आखिरी कदम है। पहली-दूसरी कक्षा में सुनना फिर बोलना फिर पढ़ना कौशल बढ़ाया जाना चाहिए। लिखना सबसे बाद में होना चाहिए। उसके लिए भी पहले-पहल चित्रकारी कराना उचित होता है। लेकिन अधिकतर स्कूलों में लिखना फिर पढ़ना फिर बोलना और फिर सुनना पर जोर है। यह पढ़ना सीखने के सही तरीके को सिर के बल खड़ा करने जैसा है। 
‘पढ़ने का गृहकार्य दिया गया है।’ ऐसा सुनने को प्रायः नहीं मिलता। पढ़ना सीखना या पढ़ना सीखाना बेहद आनंददायी है। हर नई चीज़ देखने में, नया सीखने में हमें आनंद की अनुभूति होती है। पढ़ना सीखने में बच्चे मज़ा लेते हैं। उस मज़े को वे महसूस भी करते हैं। बच्चे कंप्यूटर, टीवी, मोबाइल चलाना आसानी से सीख लेते हैं। साईकिल पर संतुलन साधने में उन्हें रोते-चिल्लाते नहीं देखा गया। फिर यह कहना क्या उचित होगा कि बच्चे अर्थ के साथ पढ़ना नहीं सीख सकते? 
कई उदाहरण हैं जहां स्कूल में बच्चों को नियम सिखाने वाले शिक्षक की बजाय एक सुगमकर्ता के तौर पर सहायता मिली, वहां बच्चों ने तेजी से पढ़ना सीखा है। जहां पढ़ने के नियम सिखाने, उच्चारण पर पहले दिन से जोर देने, तीव्र टीका-टिप्पणी करने के बजाय स्वतंत्र, बिना दबाव के आनंददायी पठन सामग्री दी जाती है, वहां पढ़ना समझ के साथ दिखाई देता है। 
कविता भी पढ़ना सीखने में बेहद कारगर विधा है। बुनियादी शिक्षा में कविता सुनाकर और कविता पढ़कर छात्रों में पढ़ने की आदत को विकसित किया जा सकता है। कविता को पढ़ने की दिशा में सरल और सहज माध्यम बनाया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि हमारे पास कविताओं का विपुल भण्डार हो। कविता का मकसद मात्र आनंद देना ही नहीं है। वह पढ़ने-लिखने और अभिव्यक्त करने का जरिया भी होती है। यदि कविताओं का चुनाव ज़रा सोच-समझकर किया जाए तो यह सब मज़ेदार गतिविधि का माध्यम बन सकती हैं। 
आइए कविता के प्रयोगों से पूर्व ज़रा इन सवालों के जवाब देंते हैं।
पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए क्या कक्षा की पाठ्यपुस्तक में शामिल कविताओं पर निर्भरता उचित है? यदि नहीं तो क्यों? 
बुनियादी कक्षाओं में कविता को पढ़ने के लिए अधिकाधिक स्थान क्यों देना चाहिए? 
कविता को अभिनय और हाव-भाव के साथ पढ़ना कारगर कैसे है?
इन तीनों सवालों पर विचार करने पर अमूमन हम पाते हैं कि किसी भी कक्षा की भाषा की पुस्तक किसी भी बच्चे के पठन कौशल को बढ़ाने के लिए काफी नहीं। यह भी सही है कि आरंभिक कक्षाओं में मौखिक कविताओं को अधिक से अधिक स्थान देना चाहिए। एक से बढ़कर एक कविताओं को पढ़कर सुनाना भी बच्चों में पढ़ने की ललक पैदा कर सकता है। कविताओं को हाव-भाव के साथ पढ़कर सुनाना तो एक मज़ेदार गतिविधि हो जाती है। बच्चे अनुमान और कल्पना के भाव संजोने लगते हैं। 
बच्चों को पढ़ने के सरल तरीके और विविधता से भरी पठन सामग्री देना पढना सीखने में रोचकता और आनन्द पैदा करता है। कविता से ही बच्चे तेजी से अर्थ ग्रहण की आदत भी विकसित करते हैं। कविता से संज्ञानात्मक और भावनात्मक सक्रियाएं भी सहजता से विकसित होती हैं। कविताओं के माध्यम से बच्चे अपने परिवेश से भी जुड़ने की ओर अग्रसर होते हैं।   
अधूरी कविता पढ़कर सुनाना
स्कूली किताब से बाहर छपी कविता कक्षा में लेकर सुनाना आनंददायी गतिविधि है। यहां उदाहरण के लिए श्री प्रसाद की ‘जामुन’ कविता दी जा रही है। अध्यापक ने इस कविता को आधा पढ़कर सुनाया। फिर बच्चों से कहा-‘‘इस कविता में आगे क्या हुआ होगा? चलो। मैं फिर से पढ़कर सुनाता हूँ।’’ अध्यापक ने कविता का फिर उतना ही अंश पढ़कर सुनाया। इसके बाद बच्चों ने खूब बातें कीं। बच्चों ने अपने अनुभवों के आधार पर हैरानी जतायी कि जामुन के पेड़ पर आम कैसे आ सकते हैं। जामुन का पेड़ कैसा होता है। आम के पेड़ के पत्तों पर बात करते हैं। 
यह जानने के लिए आप कविता पढ़ सकते हैं। फलों के स्वाद पर भी खूब बात की। बादाम क्या होता है? यह कैसे उगता है। ऐसे सवाल खूब हुए। लेकिन सवाल-जवाब तो यहां मकसद नहीं है। यहां तो कविता पढ़ने की ओर बच्चों को प्रेरित करना है। लेकिन रुचि जगाने की ओर यह बातचीत भी जरूरी है। 
जामुन
पौधा तो जामुन का ही था
लेकिन आये आम
पर जब खाया तो यह पाया
ये तो है बादाम
जब उनको बोया जमीन में ............... (यहां तक ही पढ़ी जाएगी।)
अध्यापक इस अधूरी कविता को श्यामपट्ट पर भी लिख सकते हैं।  इसके बाद शेष अंश भी लिख सकते हैं। अब सभी बच्चों को इसे पढ़ने को कहा जा सकता है। 
पैदा हुए अनार
पकने पर हो गये संतरे
मैंने खाये चार।
इस गतिविधि को कराने के बाद सवाल उठता है कि ऐसा करना छात्रों में पढ़ने की ललक कैसे पैदा कर सकता है? दरअसल इस गतिविधि में बच्चे पहली बार तो संभवतः सुनते ही हैं। जैसे ही अध्यापक यह कहते हैं कि कविता में आगे क्या हुआ होगा। बच्चे फिर से कविता के बारे में सोचने लगते हैं। अध्यापक फिर से इस कविता को पढ़ते हैं। अधिकतर बच्चे एकाग्रता के साथ कविता सुनते हैं। सुनते-सुनते कविता में आए भाव, बोध और चित्रण के बारे में सोचने लगते हैं। अध्यापक के कविताधारित सवालों का जवाब भी देते हैं। वहीं अनुमान और कल्पना का सहारा लेकर वह स्वतः ही कविता को मन ही मन में पूरा करने की कोशिश करते हैं कि आगे क्या हुआ होगा। इसके बाद जब अध्यापक पूरी कविता पढ़ने के लिए श्यामपट्ट पर लिखते हैं तो बच्चे उसे स्वतः पढ़ने का प्रयास करते हैं। उनकी कल्पना की कविता और कवि की कविता में अंतर तलाशने लगते हैं। लेकिन अंतर क्या था? अध्यापक इस पर बात नहीं करते। कारण साफ है। यहां तो अध्यापक का मकसद बच्चे में पढ़ने के प्रति ललक जगाना भर है। अंत में अध्यापक एक बार फिर से पूरी कविता पढ़कर सुनाएंगे। बच्चों ने जो स्वतः पढ़ा या पढ़ने की कोशिश की। अब वे उसका मिलान अध्यापक द्वारा पढ़े गए तरीके से अवश्य करना चाहेंगे।  
कविता पढ़कर चित्र बनाना 
अध्यापक ने बिना निर्देश दिए गुलज़ार की लिखी कविता ‘बिजली की नोक’ को श्यामपट्ट पर लिख दिया। लिखने के बाद उसे एक बार पढ़ दिया। बच्चों से कहा-‘‘इस कविता को एक बार फिर पढ़ें। पढ़कर कोई चित्र बनाएं। चित्र कविता से जुड़ना चाहिए।’’ 
बिजली की नोक
इक बिजली की नोक लगी
ऊनी बादल को
उधड़ के तागा-तागा
बादल बरस गया।
ऐसा करना भी मज़ेदार रहा। बच्चे काॅपी-पेंसिल निकाल चुके थे। बच्चे बार-बार श्यामपट्ट पर लिखी कविता को पढ़ रहे थे। बार-बार पढ़ते हुए सोच रहे थे। सोचते-सोचते वे कुछ सवालों पर आ गए थे। बच्चों ने सवाल करने शुरू कर दिए। क्या बारिश भी दिखा सकते हैं? बादल को स्वेटर कैसे पहनाएं? क्या रंग भी भरना है? बिजली के तार भी दिखाने होंगे? हालांकि बच्चों को इस गतिविधि का मकसद चित्र बनाना लगा। पर ‘बिजल की नोक’ कविता पढ़कर चित्र बनाना मकसद था या कविता पढ़वाना मकसद था? 
कविता पढ़कर सवाल पूछना
 बच्चों को सर्वेश्वर दयाल सक्सेना  की कविता ‘बन्दूक’ पढ़ने को दी गई। एक बार अध्यापक ने पढ़कर सुनाई। अध्यापक ने कहा-’’कविता में बहुत सारे प्रश्न छिपे हैं। इसके बाद हम मिलकर प्रश्न बनाएंगे और उनके जवाब भी खोजेंगे।’’ इस गतिविधि के लिए पर्याप्त समय दिया गया। 
बन्दूक 
अगर कहीं मिलती बन्दूक
उसको मैं करता दो टूक
नली निकाल बना पिचकारी
रंग देता यह दुनिया सारी।
हालांकि सवाल बनाना बच्चों को कठिन लगता है। लेकिन वे जवाब देने में नहीं हिचकते। सवाल बनाना हमारी गतिविधियों में वैसे भी शामिल नहीं होता। यह भी एक कारण है। सवाल-जवाब करने का मकसद तो मात्र यह था कि बच्चे बार-बार कविता पर ध्यान दें। बार-बार पढ़ें। दो टूक पर बच्चे अटक रहे थे। नए शब्दों को वे अपने सन्दर्भ से समझने की कोशिश भी कर रहे थे।
  
अलग-अलग कविताएं पढ़ने को देना 
इस गतिविधि का प्रभाव बेहद तीव्र है। अध्यापक ने कहा-‘‘मेरे पास कई सारी कविताएं हैं। ये कविताएं समूह में पढ़नी है। अध्यापक ने पहली दूसरी पंक्ति को एक समूह बान लिया। तीसरी और चैथी पंक्ति को दूसरा समूह मान लिया गया। इसी तरह पूरी कक्षा को पांच समूह में बांट दिया गया। एक समूह को एक कविता पढ़ने के लिए दे दी गई है। 
चाँद 
चाँद न आया बादल में,
रात न आई काजल में,
तारे नीले अंबर में,
नावें नील समन्दर में
-प्रभात

तितली
निकली सैर सपाटे पर,
तितली बैठी का काँटे पर।
-चन्दन यादव

भूख लगी है
भूख लगी है चाँद को,
फ्राई कर लें,
सूरज अण्डा छोड़ गया,
ट्राई कर लें।
-गुलजार

बूँद
एक बूँद आई
आँख मूँद आई,
उसे ढूँढने फिर
बूँद-बूँद आई।।
-सुशील शुक्ल

बादल
बादल आये मेले में,
पानी लेकर ठेले में,
बरे खूब बाज़ारों में
बूँदें अटकी तारों में।
-गुलजार

इन छोटी-छोटी कविताओं का बड़ा असर देखने को मिला। समूह में हर बच्चे कविताओं को उचक-उचक कर पढ़ रहे थे। उन्हें लगा कि कविता से कुछ पूछा जाएगा। फिर ऐसा भी हुआ कि दूसरे समूह के बच्चे पहले समूह की कविता को भी पढ़ना चाहते थे। वे यह पढ़कर समझना चाहते थे कि उन्हें दी गई कविता दूसरे समूह को दी गई कविता से कैसे अलग है और क्यों? इस गतिविधि से स्पष्ट हो गया कि बच्चे लपककर नई पठन सामग्री पढ़ने को उत्सुक रहते हैं। पाठ्यपुस्तक में शामिल कविताओं से हटकर कविता पढ़ने का अनुभव उन्हें भा गया। पुस्तक से हटकर कविताएं पढ़ने को देना और समूह में पढ़ने का तरीका रोजमर्रा की कक्षा के तरीके से अलग था। ऐसा करने में बच्चों को मज़ा आया। इस गतिविधि से कई सारी बातें सामने आई। एक तो समूह में पढ़ना तेजी से सीखना हो सकता है। दूसरा वे एक-दूसरे की मदद करते हैं। एक-दूसरे के पढ़ने के तरीकों से, उच्चारण के सन्दर्भ में भी वह सुनकर सीखते हैं। कविता पढ़ते समय वे अनुभव भी साझा करते हैं। 

कविता के माध्यम से पठन
हम सब जानते हैं कि लोरियों से लेकर शिशु गीत, कविताएं बच्चे स्कूल आने पहले सुनते आए हैं। यहां तक कि वे कई कविताएं ज़बानी सुनाने लगते हैं। कविता सुनाने और सुनने की समृद्ध परम्परा स्कूलों में भी रही है। अब तो कविता पढ़कर सुनाना और कविता सुनाना, काव्य पाठ-गोष्ठी का प्रचलन भी बढ़ा है। कवि, गीतकार आदि के रूप में कॅरियर और रोजगार की दृष्टि से भी यह क्षेत्र विकसित हो चुका है। बुनियादी कक्षाओं में कविताएं सुनाने और पढ़ने को स्थान बाल सभा और पाठ्य सहगामी गतिविधियों में दिया जाता रहा है। 
कक्षा-कक्ष में कविताओं का प्रयोग 
शिक्षक अक्सर पाठ्य पुस्तक की कविताओं से, अपनी स्मृति पर आधारित कविताओं से, अख़बार-पत्रिकाओं में छपी कविताओं से कक्षा शिक्षण को रोचक बनाते रहे हैं। कविता सुनाकर और कविता पढ़कर सुनाने के असर को हम इस तरह से देखते आए हैं।
छात्रों का सुनना कौशल बेहतर होता है।
एकाग्रता की क्षमता का विकास होता है।
पठन कौशल के बेहतर तरीके का विकास होता है। 
सुनकर कविता में आ रहे भावों, पात्रों की कल्पना करने लगते हैं।
सपाट पठन की बजाय छात्र कविता में आ रहे भाव, उतार-चढ़ाव को अभिव्यक्त करने की कला पर ध्यान देते हैं।

कविता पढ़कर सुनाने से पहले  
लंबे और गूढ़ शब्दों वाली कविताओं की बजाय सरल और छोटी हो। 
कविता कक्षा कक्ष में पढ़ाने वाले पाठ या प्रकरण के अनुकूल हो। उसे आगे बढ़ाती हो।
कविता में उत्सुकता, जिज्ञासा बनाए रखने की क्षमता हो।
बच्चों की दुनिया, उनके आस-पास से जुड़े परिवेश की कविताएं अवश्य हों। 
कविता पढ़ी जाए। उसकी व्याख्या न की जाए। 

कविता पढ़ने के बाद                                                
 यहां कविता पढ़ने का मकसद आनंद के साथ ऐसी पहल है जिससे बच्चे भी छपी हुई कविताएं पढ़ने की ओर बढ़ें। सुनकर कविता पढ़ने के बाद संभव है कि चर्चा के दौरान बच्चे कहीं असहज हों जाएं। लेकिन छपी हुई कविता पढ़ने के बाद वे कविता में खुद भी झांक सकते हैं। सवाल-जवाब में शामिल होने के लिए वे एक बार फिर से कविता को पढ़ने की कोशिश कर सकते हैं। यही कारण है कि धीरे-धीरे कविता सुनाने के तरीके को कविता पढ़कर सुनाने के तरीके में जाना अधिक प्रभावकारी होता है।

कविता आधारित अन्य गतिविधियां                                         
शीर्षक पर चर्चा कर कविता पढ़वाना। 
मुखर वाचन यानि कविता को उचित गति, हाव भाव से पढ़कर सुनाना।
चित्र देखकर चर्चा करना फिर कविता पढ़वाना। 
समूह में कविता पढ़ने को देना।
एक साथ पढ़ना। 
पढ़ी हुई कविता को अपने शब्दों में अभिव्यक्त करना। 
किसी कविता में आए शब्दों पर चर्चा करना फिर कविता पढ़ने को देना।
किसी कविता पर आधारित प्रश्न करना फिर कविता पढ़ना।
पढ़कर सुनी हुई कविता के विषयवस्तु पर बात करना।
पढ़कर सुनी हुई कविता का रोल प्ले करना।

कविता की ताकत
अनुमान और कल्पना के भाव जगाती है। 
बोलने का लहज़ा विकसित कराती है।
बार-बार आए शब्दों से पढ़ना सहज कराती है।
तुकांत शब्दों से पढ़ना सरल होता है।
ध्वनियों के प्रति सजगता बढ़ाती है।
वर्ण, मात्रा और शब्दों से जूझना आसान होता है।
शब्द के अर्थों की ओर ले जाती है। 
कविता धारा प्रवाह पढ़ने की ओर बढ़ाती है। 
पढकर समझ का निर्माण कराती है।
लेखन की ओर ले जाती है। 
कविता ही क्यों?
स्वतंत्र पाठक तैयार कराने में सहायक।
पढ़ने में निरन्तरता में सरल।
खोजकर पढ़ने की ओर अग्रसर कराती है।
॰॰॰
लेखक परिचय: मनोहर चमोली ‘मनु’: ‘ऐसे बदली नाक की नथ’ और ‘पूछेरी’ पुस्तकें नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हुई हैं। ‘चाँद का स्वेटर’ और ‘बादल क्यों बरसता है?’ पुस्तके रूम टू रीड से प्रकाशित हुई हैं। बाल कहानियों का संग्रह ‘अन्तरिक्ष से आगे बचपन’ उत्तराखण्ड बालसाहित्य संस्थान से पुरस्कृत। बाल साहित्य में वर्ष 2011 का पं॰प्रताप नारायण मिश्र सम्मान मिल चुका है। बाल कहानियों का दूसरा संग्रह ‘जीवन में बचपन’ प्रकाशनाधीन है। बाल कहानियों की पच्चीस से अधिक पुस्तकें मराठी में अनुदित होकर प्रकाशित। उत्तराखण्ड में कहानी ‘फूलों वाले बाबा’ कक्षा पाँच की पाठ्य पुस्तक ‘बुराँश’ में शामिल। उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग में  शिक्षक हैं। सम्पर्क: भितांई, पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी, पौड़ी गढ़वाल.246001.उत्तराखण्ड. मोबाइलः09412158688. 

13 अक्तू॰ 2017

दूर तलक जा सकती है बाल किलकारी की आवाज़ info@kilkaribihar.org, publication@kilkaribihar.org

दूर तलक जा सकती है बाल किलकारी की आवाज़

-मनोहर चमोली ‘मनु’

‘बाल किलकारी’ के दो अंक एक साथ डाक से मिले। बच्चों की मासिक पत्रिका ‘बाल किलकारी’ प्रकाशित हो रही है। इसे किलकारी बिहार बाल भवन, राष्ट्रभाषा परिषद परिसर प्रकाशित कर रहा है। 
2017 के माह जुलाई और अगस्त के अंक शानदार हैं। आवरण मन को भाते हैं। ये ओर बात है कि आवरण के चित्र साभार इंटरनेट लिए गए हैं। आवरण बच्चों की दुनिया का प्रतिनिधित्व करते हैं। स्तम्भ ‘तुम्हारी रचना‘ के चार पेज बच्चों के बाल मन का सम्मान करते हुए रंगीन हैं। उम्मीद जगाते हैं कि ये पत्रिका भविष्य में बहुरंगी हो जाएगी। स्तम्भ ‘तुम्हारी ‘पेन्टिंग‘ सीधे बच्चों की आवाज़ों को स्थान देता है।

पत्रिका के भीतर झांकने का झरोखा आंखों को थकाता नहीं है। यह पेज आसानी से बताता है कि पत्रिका 48 पेज की है। चिट्ठी-पत्री में पाठकों के पत्र शामिल होते हैं। नियमित स्तम्भों में कार्टून का पन्ना पवनटून के जिम्मे है। बच्चों के लिहाज से एक महीने एक ही कार्टून हो तो ज्यादा असरदार होगा। जुलाई के अंक में ही चार-चार कार्टून एक पेज में दे दिए गए हैं। वे भी आकार में असमान। अक्षरों का आकार दस से कम। कार्टून चित्र से ज़्यादा प्रभावी होते हैं यदि उसमें भाषा का उपयोग सांकेतिक हो तो बेहतर वर्णनात्मक हो तो कार्टून कैसा? 
कहानियां चार से छह शामिल हो रही हैं। यह अच्छा संकेत है। कविताएं भी तीन से आठ के मध्य शामिल हो रही हैं। पत्रिका विज्ञान को भी अच्छा खासा महत्व दे रही है। या तो विज्ञान कथा ज़रूर रहेगी या विज्ञान के प्रयोग को स्थान मिल रहा है। समझो-बूझो, शब्द पहेली, चुटकुले, पहेली, एक अधूरी कहानी पूरी हुई, जीव-जंतु, जानकारी, रोचक, सिनेमा, दुनिया-जहान और बापू कथा नियमित काॅलम हैं। कागज़ 70 जीएसएम से कम नहीं है। पत्रिका की उम्र लंबी रहेगी। चित्रांकन उमेश शर्मा के हैं। अधिकतर चित्र हाथ से स्कैच किए हैं। ये बेहतर है। कंप्यूटर में बने-बनाए चित्र बच्चों को वो काल्पनिकता नहीं दे पाते। पेज ले आउट जहां दो काॅलम में बन रहे हैं वे पाठक के ज़्यादा करीब हो जाते हैं। जिसे सीधे पाठय पुस्तक के तौर पर रखा जा रहा है वह पेज न तो भाता है उसे पढ़ने में पाठक की आंखें थकती हैं। ये अच्छी बात है कि पत्रिका सिनेमाई जगत को बच्चों की नज़र से देखने का प्रयास करती नज़र आती है। चुटकुलों में अभी वह स्तर आने की संभावना दिखाई पड़ती है जो बच्चों में स्वस्थ मनोरंजन करें। 

इन अंकों को देखकर-पढ़कर पता नहीं चल पा रहा है कि ये कब से प्रकाशित हो रही है। वर्ष का और अंक के क्रम का उल्लेख संभवतः इसलिए भी नहीं है कि डाक पंजीयन और पत्रिका का विधिक पंजीयन की प्रक्रिया चल रही होगी। इस माह पत्रिका में रचनाएं किस रचनाकर की हैं यह पन्ने उलटने से पता चलता है। संभवतः रचनाकारों के नाम रचना के साथ दें तो पाठकों को अधिक सहूलियत होती है। रचनाकारों को भी और भविष्य में पुराने अंकों को देखने की आवश्यकता पड़े तो यह पेज बहुत मदद करता है। यह अच्छी बात है कि बाल किलकारी इस बात को बखूबी समझ रही है कि पत्रिका की रचनाएं बच्चों के लिए अधिक महत्वपूर्ण है न कि रचनाकार की फोटो और पते-सम्पर्क आदि। पाठक यदि चाहे तो पत्रिका से सम्पर्क कर लेखकों के पते और अधिक विवरण मांग सकता है। कम से कम बच्चों की पत्रिका में रचनाकारों के बड़े-बड़े माॅडलिंग टाइप के चित्र देने का जो चलन चल पड़ा है उसके पीछे बालमन की उथली समझ ही सामने आकार लेती है। 
पत्रिका कहीं भी जबरन ठूंसी सामग्री पेश नहीं करती। भारी-भरकम सामग्री नहीं है। पेजों को खुला-खुला रखा गया है। दो अंकों को देखकर यह इशारा साफ मिलता है कि भविष्य में यह पत्रिका परम्रागत बाल साहित्य से हटकर नए प्रतिमान गढ़ेगी। हालांकि फिलहाल के अंकों में भी आदर्शवाद है। बड़ों का बड़ापन वाला नज़रिया भी दिखाई देता है लेकिन धीरे-धीरे आधुनिक भाव-बोध और यथार्थ की रचनाओं को जैसे-जैसे अधिक स्थान मिलेगा वैसे-वैसे ही उपदेशात्मक,आदेशात्मक और आदर्श से भरी रचनाएं सिमट जाएंगी। 
पत्रिका को पढ़ते हुए, पलटते हुए स्पष्ट आभास होता है कि इसके प्रकाशन में व्यक्ति नहीं समूह जुड़ा हुआ है। ये ओर बात है कि पत्रिका में तीन-चार नाम जरूर हैं लेकिन इसे मूर्त रूप देने में एक सामूहिकता, सहयोग और सामुदायिकता की खुशबू पाठक महसूस कर सकते हैं। बाल किलकारी के बहाने यह कहना भी सही होगा कि बच्चों की पत्रिका के लिए व्यक्तिवादी निजी सोच लम्बे समय तक नहीं चल सकती। इसके लिए तो परामर्श, सहयोग और सामूहिकता ही चाहिए। 
एक बात तो तय है कि बाल किलकारी को यह जल्दी समझना होगा कि वह बच्चों को सूचनात्मक जानकारी देना चाहती है या स्कूली बच्चों को पाठ्य पुस्तक की एक और सहायक सामग्री या पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए विशिष्ट सामग्री की पत्रिका देना चाहेगी। बाल किलकारी को यह समझना होगा कि एक ओर पढ़ने के विभिन्न माध्यम सूचना तकनीक के दौर में आ चुके हैं। जानकारी और ज्ञान बढ़ाने के कई तरीके आज उपलब्ध हैं। ऐसे में छपी सामग्री की ओर बच्चों की ललक बनाना पहला मक़सद होगा तो सामग्री में सूचना, जानकारी और ज्ञान भरने के इरादों से इतर मस्ती, मनोरंजन और आनंद देने के ध्येय को बढ़ाना होगा।  
कुल मिलाकर मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि यह पत्रिका बाज़ार में उपलब्ध और सदस्यता आधारित पत्रिकाओं में विशिष्ट पहचान बना ही लेगी। शीघ्र-अतिशीघ्र इस पत्रिका से जुड़ने को अधिकतर रचनाकार आतुर होंगे और पाठकों, शिक्षकों और अभिभावकों को भी बाल किलकारी अपनी टीम का हिस्सा बनाने में कामयाब होगी।
पत्रिका: बाल किलकारी
मूल्य: 20 रुपए
पेज: 48
परिकल्पनाः ज्योति परिहार
सम्पादक: शिवदयाल
सम्पादन: राजीव रंजन श्रीवास्तव
प्रकाशक: किलकारी, बिहार बाल भवन, सैदपुर,पटना 80004 बिहार
सम्पर्क: 9835224919,746387822 
मेल: info@kilkaribihar.org,
publication@kilkaribihar.org 
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-मनोहर चमोली ‘मनु’ 

3 अक्तू॰ 2017

संस्मरण बचपन का : कुछ तो बात है children life

कुछ तो बात है 

-मनोहर चमोली मनु’

स्कूल जाने के पहले दिन की इतनी ही याद है कि मेरा पहला शिक्षक एक अध्यापिका थी। बच्चे टाट-पट्टी पर बैठे हुए थे। मुझे भी वहीं बैठना था। अध्यापिका के माथे पर पूर्णमासी के चाँद सरीखी, बड़ी-सी लेकिन सूर्ख लाल बिन्दी चमक रही थी। सिर के बीचों-बीच लंबी माँग करीने से निकाली गई थी। माँग में लाल सिन्दुर दूर से ही चमक रहा था। अध्यापिका के हाथ हलके से हिलते तो चुड़िया खनखनाती हुई बज रही थीं। अध्यापिका ने रंग-बिरंगी साड़ी पहनी हुई थी। पैरों में चमकीली पाजेब भी उनके चलने पर बज उठती।  
मैं घर से स्कूल कैसे गया? मेरे साथ कौन था? मैंने पहला अक्षर कैसे और कब सीखा था? मैंने पढ़ना कैसे सीखा? इन सवालों का जवाब मैं नहीं दे सकूँगा। कारण? कुछ भी याद नहीं। हाँ। इतना जरुर याद है कि स्कूल जाने से पहले मैं अपने दो बड़े भाईयों को स्कूल जाते हुए देखता था। शायद उन्हें स्कूल जाते हुए देखकर, मेरे मन में विद्यालय की केाई प्यारी-सी छवि बन गई होगी। 
शायद यही कारण रहा होगा कि मैं भी अपने दोनों बड़े भाईयों की तरह बिना चीखे-चिल्लाए और रोए स्कूल जाने के लिए सहर्ष तैयार हो गया हूँगा। विद्यालय में मेरी पहली पिटाई कब हुई? यह भी याद नहीं है। हाँ। इतना जरूर याद है कि मुझे अक्षर ज्ञान कराने वाली स्कूल में दो अध्यापिकाएँ थीं। हैडमास्टर सरदार थे। उनकी पगड़ी हर रोज रंग बदल देती थी। लेकिन वह केवल कक्षा पाँच को ही पढ़ाते थे। 
छोनों अध्यापिकाओं के बच्चे भी हमारे सहपाठी थे। अक्सर हमारी अध्यापिकाएँ पिटाई की शुरुआत अपने बच्चों से ही करती थीं। कई बार तो ऐसा होता था कि सुबह बड़ी अध्यापिका अपने बच्चों को पीटती तो मध्यांतर के बाद छोटी वाली अध्यापिका अपने बच्चों पर टूट पड़तीं। मुझे अच्छे से याद है कि दोनों अध्यापिकाएँ जब पीटती थीं तो इतना पीटती थीं कि उनकी कलाई पर पहनी रंग-बिरंगी चूड़िया जिनमें हरी और लाल ज्यादा होती थीं, टूट जाया करती थीं। कई बार चूड़ियाँ टूटते समय या तो उनके हाथों को जख़्मी कर देती थीं या जिसकी पिटाई हो रही है उसके गाल, कान, गले आदि में चूड़ियों के टूकड़ों से छिटपुट घाव हो जाया करते थे। 
विद्यालय में मेरी पहली पिटाई कब हुई थी? यह भी याद नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि मेरी स्कूल में पिटाई ही नहीं हुई। हुई है। लेकिन मैं अन्य सहपाठियों की तरह अधिक नहीं पीटा गया हूँ। उन दिनों बुनियादी स्कूल में अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जाती थी। मैंने अंग्रेजी के वर्ण कक्षा छह में जाकर सीखे। फिर भी बुनियादी स्कूल सज़ा का केन्द्र था। मन-मस्तिष्क में यह गहरे पैठ गया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, स्कूल तो जाना ही पड़ेगा। मैंने स्कूल न जाने का कभी बहाना नहीं बनाया। यह मुझे याद है। 
हमारा स्कूल बहुत दूर था। अक्सर देर से स्कूल पहुँचने वाले छात्रों की प्रातःकालीन सभा में ही पिटाई हुआ करती थी। सजा देने से पहले देर से आने छात्रों की अलग से लाईन बन जाती थी। प्रातःकालीन सभा की समाप्ति पर देर से आने वालों को छोड़कर अन्य छात्र अपनी-अपनी कक्षाओं में चले जाते थे। सज़ा देने की जिम्मेदारी हैडमास्साब की हुआ करती थी। वह इस बहाने कभी हथौड़े (स्कूल का घण्टा बजाने वाला लकड़ी का हथौड़ा) से सिर पर गुठली बना दिया करते थे। दो-दो लड़कियों की चुटिया बाँधकर गोल-गोल घुमाते थे। रिंगाल (बाँस की एक जंगली प्रजाति) की बेंत से कभी हाथों में तो कभी पुटठों पर पिटाई होती थी। लड़कों को मुर्गा बनाकर उनकी पीठ पर ईंट रख दी जाती थी। यदि ईंट गिर गई तो फिर बेंत से पिटाई हुआ करती थी। सबसे मारक पिटाई कण्डाली से होती थी। कण्डाली को बिच्छू घास भी कहा जाता है। हाथों और पैरों में इस घास को छुआया जाता था। कण्डाली के काँटे शरीर में चुभ जाते थे। जिस पर कण्डाली लगती थी, वह सूसूसूसू की आवाज निकालता। झनझनाहट तो कई बार चैबीस घण्टे तक रहता था।  
अध्यापिकाएँ तो थप्पड़ों और मुक्कों से पिटाई किया करती थी। कभी-कभी वे तर्जनी और अनामिका के बीच पेंसिल रखकर जोर से दबाया करती थीं। तब अंगुलियों में तीव्र दर्द हुआ करता था। हम सब बुनियादी स्कूलों में टाट पट्टी पर ही बैठा करते थे। एक सज़ा यह भी हुआ करती थी कि खड़े रहो। मध्यांतर तक भी लगातार खड़ा रहना अजीब सा लगता था। यदि दीवार के सहारे पीट टेक ली तो मुर्गा बनने की दूसरी सजा मिल जाया करती थी। 
कक्षा एक से पाँच तक का बुनियादी स्कूल नए प्रवेशित बच्चों को देखा-देखी बहुत कुछ सीखा देती है। वरिष्ठ छात्रों को पीटता देख कर नवागंतुक छात्र तो वैसे ही सहम जाते थे। तब यही मनावैज्ञानिक तरीका था कि बड़ी कक्षाआंे के एक-दो बच्चों को पीट दो,छोटी कक्षा के बच्चे खुद-ब-खुद चुप हो जाएँगे। 
मेरे बुनियादी स्कूल में कक्षा एक और दो के छात्रों को एक साथ बिठाया जाता था। कक्षा तीन और चार के छात्रों को एक साथ और कक्षा पाँच के छात्र दूसरी कक्षा में बिठाए जाते थे। उन दिनों समूचा स्कूल दो या तीन कक्षों में ही सिमटा होता था। सुबह का घण्टा बजने से स्कूल की छुट्टी का घण्टा बजने तलक स्कूल प्रांगण में बहुत कुछ ऐसा घटता था, जो सबके सामने घटता था। कक्षा पाँच के छात्रों की पिटाई हो रही है तो कक्षा चार से लेकर कक्षा तीन के छात्र भी सतर्क हो जाया करते थे। कक्षा एक और दो के बच्चे आँखें फाड़-फाड़कर देखते थे। मानो किसी खेल का सीधा प्रसारण देख रहे हों। मुझे लगता है कि दब्बू, डरपोक, संकोची, अंतर्मुखी बच्चे स्कूल में अग्रेतर छात्रों के साथ घट रही घटनाओं से सबक ले लिया करते हैं। मैं भी ऐसा ही करता था। बावजूद उसके सज़ा मुझे भी मिलती थी।  
एक दिन देर से आने वाले छात्रों की पिटाई हो रही थी। मैं कक्षा से उचक कर देख रहा था। हैडमास्साब की नज़र मुझ पर पड़ गई। वे दौड़ते हुए आए और सीधे मेरे सिर पर हथौड़े की एक चोट की। चोट बहुत तेज तो न थी, लेकिन सिर पर एक गुठली तो बन ही गई थी। मुझे याद है कि वह मध्यांतर के बाद तक भी वह गुठली सिर पर कायम रही। एक बार की बात है। मध्यांतर हुआ। उन दिनों क्रिकेट खेल देखना रोमांचकारी अनुभव हुआ करता था। दो बड़ी कक्षाओं के सहपाठी मुझे अपने साथ मैच दिखाने ले गए। हम मैच देखने में इतना रम गए कि समय का आभास ही नहीं रहा। उन दिनों कलाई घड़ी भी आम नहीं हुआ करती थी। सूरज के ढलने और उगने के हिसाब से समय का अनुमान लगाया जाता था। दौड़-दौड़ कर स्कूल पहुँचे तो स्कूल में छुट्टी हो चुकी थी। हमारे बस्ते भीतर ही कैद हो गए थे। घर पहुँचे तो खूब डाँट पड़ी। अगले दिन स्कूल तो जाना ही था। स्कूल में पूरा दिन मुर्गा बना रहा। मध्यांतर में भी हम मुर्गा बना रहे। कमर और घुटनों में दर्द कई दिनों तक रहा। 
एक दिन हैडमास्साब नहीं थे। दूसरी अध्यापिका भी नहीं थीं। कक्षा पाँच को छोड़कर अन्य कक्षाएँ एक साथ बैठी थीं। हम छात्रों की बातचीत शोरगुल में बदल गई। फिर कलम, लंच बाॅक्स और किताबें हम एक-दूसरे पर उछालने लगे। हम टाटपट्टी में कक्षावार लाईन से बैठे हुए थे। मेरे आगे बैठे सहपाठी ने दूर बैठी किसी छात्रा के पिता का नाम लेकर उसे चिढ़ाया। छात्रा ने चिढ़कर छोटा सा पत्थर मेरे सहपाठी को निशाना बनाकर फेंका। ठीक मेरे आगे बैठा सहपाठी झुक गया। परिणामस्वरूप पत्थर मेरी बाँयी आँख के ठीक ऊपर माथे पर जा लगा। 
‘‘खून-खून!’’ मेरा सहपाठी चिल्लाया। दो-तीन बच्चे अध्यापिका को बुला लाए। मेरी आसमानी कमीज और खाकी पैण्ट में खून की बूँदे टपक-टपक कर उन्हें बदरंग बना चुकी थी। अध्यापिका आईं। अध्यापिका ने मुझे पकड़कर पानी की टंकी के नीचे खड़ा कर दिया। मेरा सिर धोया। अपने साड़ी के पल्लू से मेरा सिर पोंछा। माँ की तरह दुलारा। खून था कि रुक ही नहीं रहा था। अध्यापिका दौड़कर किसी डाॅक्टर से रुई, डिटाॅल और पट्टी ले आईं। मेरी मरहम-पट्टी की। 
मध्यांतर हुआ। अध्यापिका ने मुझे अपने घर से लाए पराँठा और मेथी-सौंप की खुशबू से भरा आम का आचार खिलाया। सब कुछ सामान्य होने के बाद सब अपनी-अपनी कक्षा में चले आए। उस छात्रा को अध्यापिका ने दूसरे कमरे में बुलाया। उसकी खूब पिटाई हुई। वह जोर-जोर से चिल्ला रही थी। रो रही थी। मुझे अजीब सा लग रहा था। पिट वो रही थी और डर मैं रहा था। घर जाकर मेरी पिटाई तय है। मैं यही सोच रहा था। लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ। घरवालों को मेरी आँख बच जाने से संतोष था। उस दिन के बाद शायद ही उस छात्रा ने मेरे साथ कभी बात की हो। लेकिन मेरे आगे बैठने वाला वह सहपाठी उस छात्रा को कई दिनों तक चिढ़ाता रहा। कहता रहा-‘‘ले। पत्थर दूँ। लगा निशाना। लगा-लगा।’’ कक्षा पाँच में पहुँचा तो हैडमास्साब का फरमान सुना-‘‘सब निब वाले पैन से ही लिखेंगे। किसी के पास डाॅट पैन होगा तो मैं उठा कर फैंक दूँगा।’’ वे ऐसा ही करते। यदि कोई डाॅटपैन से लिखता हुआ दिखाई देता तो वे सबके सामने पैन के दो टूकड़े कर दिया करते थे। 
एक दिन हैडमास्साब स्कूल में नहीं थे। हमारी कक्षा खाली थी। खाली दिमाग शैतान का घर होता ही है। किसी छात्र ने निब के पैन से स्याही छिड़क दी। मेरी कमीज पर उसके धब्बों ने विचित्र सा आकार बना दिया। मुझे गुस्सा आया। मैंने अपना पैन निकाला और जोर से छिड़क दिया। उसके धब्बे दूर तक नहीं जा पाए। तभी मेरे दूसरे सहपाठी ने अपनी हथेली में स्याही की शीशी रख ली। वह एक टाँग पर चलने लगा। शीशी प्लास्टिक की थी। वह लुढ़ककर दूसरे सहपाठी के सिर पर जाकर फैल गई। स्याही गले से कालर और फिर कमीज की यात्रा पर चल पड़ी। मैंने वह स्याही की शीशी उसके काॅलर से निकालने की कोशिश की ही थी कि हैडमास्साब आ गए। 
बस फिर क्या था। उन्होंने आव न देखा ताव और मुझ पर बरस पड़े। सिर पर, गले में,  गालों में, कानों पर चटाचट थप्पड़ों की बारिश से मैं अपने घुटनों पर जाकर सिमट गया। तभी स्याही से भीगा छात्र बोला-‘‘सरजी। ये नहीं, वो था।’’
हैडमास्साब का हाथ हवा में ही रुक गया। जो होना था, वो तो हो चुका था। मैं पीटा जा चुका था। हैडमास्साब के होंठो के किनारों पर सफेद थूक जम चुका था। उनकी सांसें जोर-जोर से बाहर आने का आतुर थी। बड़ी-बड़ी आँखें लिए वह कक्षा से बाहर निकल गए। फिर बेंत लेकर आए। पहाड़ा पूछने के बहाने से फिर उस दिन समूची कक्षा न जाने कितनी बार पिटी। मैं फिर पीटा गया। कक्षा छह के लिए मुझे दूसरे स्कूल में भर्ती कराया गया। यहाँ आकर जैसे हम एक ही दिन में बहुत बड़े हो गए थे। हमें बैठने के लिए स्टूल और डैस्क जो मिले थे। हिन्दी पढ़ाने के लिए एक नई अध्यापिका आईं। वे जैसे ही श्यामपट्ट पर लिखने के लिए चाॅक घुमाती, सहपाठी हूहूहूहू की आवाजें़ निकालते। मैडम झट से छात्रों की ओर मुड़ती, ताकि हूहूहूहू करने वाले को पहचाना जा सके। ये रोज की बात होती। तब बगल की कक्षा के गुरुजी आते और सबको डाँट पड़ती। तब जाकर कुछ देर पढ़ाई शुरू होती। 
एक दिन मैडम ने पढ़ाया। अब श्यामपट्ट पर लिखाने की बारी थी। वे जैसे ही श्यामपट्ट की ओर बढ़ी। सहपाठी चिल्लाए। तभी मेरे दाँयी ओर बैठे सहपाठी ने अपने बाँए हाथ के अँगूठे और तर्जनी से मेरी दाँयी जाँघ पर तीव्रता से चूँटी काटी। मैं उठकर चीखा। मैडम ने समझा मैं भी हूहूहूहू करने वालों में शामिल हूँ। वो तेजी से मेरी ओर बढ़ी। मैडम के हाथ में डॅस्टर था। वही डस्टर मेरे सिर पर दे मारा। मैंने प्रहार वाली जगह पर दोनों हथेलियाँ रखी और सीट पर झुक गया। ‘धम्म। धम्म।’ तीन-चार मुक्के मेरी पीठ पर जा पड़े। गुस्से में तमतमाई मैडम सीधे स्टाॅफ रूम में चली गई। ऐसे कई किस्से हैं, जब मैं अकारण भी पीटा गया। 
दो-दो साल बड़े दो भाई के बाद में तीसरा था। मेरी छोटी बहिन मुझसे दो साल छोटी थी। मुझ पर दो भाईयों की निगाहें हमेशा रहती थीं। मेरी निगाह अपनी छोटी बहिन पर रहती थीं। यही कारण था कि पढ़ना भले ही अरुचिकर रहा हो, पढ़ने स्कूल जाना मजबूरी थी। अन्यथा मेरा वश चलता तो मैं भी औरों की तरह स्कूल जाते समय किसी पेड़ या झाड़ी में जा छिपता और छुट्टी के समय घर लौटता। मेरा वश चलता तो मैं भी कभी पेट दर्द, तो कभी दाँत दर्द का बहाना बनाता। मेरा वश चलता तो बीच-बीच में स्कूूल से बंक मार लिया करता। 
यह सब तो हो नहीं सका। लेकिन हर रोज स्कूल जाते समय यह डर तो बना रहता था कि कहीं आज स्कूल में पिटाई न हो जाए। पिटाई से बचने के लिए हर वादन में सतर्क रहना बेहद कठिन काम था। यह सब कारण स्कूल में बेमज़ा के परिणाम ही तो थे। काश ! स्कूल आनंददायी होते। आज भी अपवादस्वरूप स्कूल सज़ा देने के स्थल हैं। अधिकतर मामलों में ऐसी सज़ाएँ उसे दी जाती है, जो उन सजाओं को पाने के लिए ज़िम्मेदार ही नहीं होता। ऐसी सजा जो किसी एक को मिलनी थी, समूची कक्षा को मिलती है। ऐसी सज़ा जो बेहद सूक्ष्म हो सकती थी, लेकिन वृहद रूप में मिलती है। अपवादस्वरूप आज भी पूरी दुनिया में स्कूल ही ऐसा केन्द्र है, जहाँ दुनिया के समूचे अभिभावकों के संभवतः नब्बे फीसद बच्चे पढ़ते हैं। अभिभावक की नज़र में आज भी स्कूल उनकी आस्था का केन्द्र हैं। उन्हें लगता है कि उनका पाल्य स्कूल में घर के बाद सबसे ज्यादा सहज और सुरक्षित है। उन्हें लगता है कि उनका पाल्य बहुत कुछ स्कूल में ही सीख सकता है। लेकिन अधिकतर स्कूल आज भी स्कूल को सज़ा देने के भयावह केन्द्र के रूप में पाल-पोस रहे हैं। कुण्ठा पाल लेना सीखने का केन्द्र है। अत्याचार को चुपचाप सहन करने का अभ्यास केन्द्र है। चुप्पी साध लेने का प्रशिक्षण स्कूलों में ही दिया जाता है। आत्मकेन्द्रित हो जाने का घोल यहीं पिलाया जाता है। तमाम खतरे पाल्यों के मन-मस्तिष्क में जाने-अनजाने में ही सही स्कूल से ही प्रवेश कर लेते हैं। यह तमाम अमिट निशान फिर जिन्दगी भर शरीर का, मन का और स्वभाव का साथ देते हैं। अपने अनुभवों के आधार पर तो अब मैं यही कहूँगा कि विद्यालय में छात्रों को किसी भी प्रकार सजा नहीं दी जानी चाहिए। सजा को पहले विकल्प में तो कतई नहीं लिया जाना चाहिए। यह अन्तिम विकल्प भी नहीं है। न जाने कितने बालमन सज़ा पाने के बाद कभी जीवन के विद्यालय में सफल न हुए होंगे। सज़ा कभी सफलता का मार्ग नहीं सुझाती। उलट कई ग्रन्थियाँ बनाने को बाध्य करती है।
मुझे मेरे स्कूली जीवन में जब-जब सजा मिली। जिस प्रकार की भी सजा मिली। भले ही मैं गलती पर था। जब मैं गलती पर नहीं था, तब भी। मैं घण्टों मिली जा चुकी,भुगती जा चुकी सजा के बारे में सोचता रहता था। कई-कई दिनों तक वह समूचा चित्र मेरी आँखों के सामने घूमता रहता था। सजा का वाकया बार-बार सोचकर मैं म नही मन कुढ़ता था। खुद पर खीजता था। मेरा बहुत अनमोल समय जाया हुआ होगा। मैं आज जो कुछ हूँ, उससे इतर मैं जो कुछ हो सकता था, उसके पीछे स्कूल में मिली सजा ही जिम्मेदार है। काश ! प्रत्येक स्कूल के एक-एक कक्षा कक्ष में अत्याधुनिक कैमरे लग जाएँ। प्रत्येक स्कूल की एक-एक गतिविधि सार्वजनिक होनी चाहिए। ताकि दुनिया का कोई भी शिक्षक जानबूझकर या अनजाने में बालमन के कोमल मन-मस्तिष्क को ठेस न पहुँचाए। 
सोचता हूँ यदि दुनिया का हर स्कूल जाने वाला बच्चा हड़ताल कर दे तो क्या होगा? दुनिया का हर स्कूल जाने वाला छात्र हमेशा के लिए स्कूल की ओर पीठ कर ले तो क्या होगा? दुनिया जीते-जी मर जाएगी। सोचता हूँ कि स्कूल में मिलने वाली सजा ने न जाने कितने बचपन की परोक्ष रूप से हत्या कर दी होगी। संभवतः कहीं भी, किसी के पास स्कूल में मिलने वाली सजा के परिणामों का लेखा-जोखा नहीं है। 
विद्यालय तमाम सज़ाओं का पोषण केन्द्र है। लेकिन विद्यालय का कोई विकल्प नहीं है। आज भी विद्यालय में बच्चे समूह में सीखते हैं। भिन्न परिवार, पड़ोस और स्थलों के भिन्न-भिन्न बच्चों के बीच रहकर ही तो एक छात्र संघर्ष करता है। सीखता है। समझता है। सहभागिता, सहयोग, प्रेम, सहिष्णुता, भाईचारा आदि यहीं तो सीखता है। यही कारण है कि आज भी एक-एक विद्यालय चाहे वह कैसा भी है। कहीं भी है। भले ही वह मज़ा का केन्द्र नहीं बन पाया है, लेकिन एक-एक स्कूल की मौन बरसों से खड़ी दीवारें यही तो कहती हैं-‘‘कुछ बात तो है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।’’ ॰॰॰ 

लेखक परिचय: मनोहर चमोली ‘मनु’: ‘ऐसे बदली नाक की नथ’ और ‘पूछेरी’ पुस्तकें नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हुई हैं। ‘चाँद का स्वेटर’ और ‘बादल क्यों बरसता है?’ पुस्तके रूम टू रीड से प्रकाशित हुई हैं। बाल कहानियों का संग्रह ‘अन्तरिक्ष से आगे बचपन’ उत्तराखण्ड बालसाहित्य संस्थान से पुरस्कृत। बाल साहित्य में वर्ष 2011 का पं॰प्रताप नारायण मिश्र सम्मान मिल चुका है। बाल कहानियों का दूसरा संग्रह ‘जीवन में बचपन’ प्रकाशनाधीन है। बाल कहानियों की पच्चीस से अधिक पुस्तकें मराठी में अनुदित होकर प्रकाशित। उत्तराखण्ड में कहानी ‘फूलों वाले बाबा’ कक्षा पाँच की पाठ्य पुस्तक ‘बुराँश’ में शामिल। उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग में भाषा के शिक्षक हैं। सम्पर्क: भितांई, पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी, पौड़ी गढ़वाल.246001.उत्तराखण्ड. मोबाइलः09412158688.