4 अक्तू॰ 2016

बाल साहित्य संस्मरण रमाशंकर जी के संपादन में

बाल साहित्यकारों के बचपन में झांकती है अतीत के पन्नों से







































-मनोहर चमोली ‘मनु’
साहित्यकारों का बचपन अतीत के पन्नों से बज़रिए डाक मिली। कई क्षेत्रों में निपुण प्रख्यात बाल साहित्यकार रमाशंकर के संपादन में यह पुस्तक इन दिनों बेहद चर्चित है। आवरण राजभगत का है। यह साहित्यकरों के बचपन पर आधारित तीसरा खण्ड है। ज़ाहिर है कि इससे पहले दो खण्ड इसी भव्यता के साथ प्रकाशित हुए हैं।फ्लैप प्रख्यात बाल साहित्यकार उषा यादव ने लिखा है।
वह लिखती हैं-‘हर बचपन एक जैसा नहीं होता। समय तथा परिवेश की ज्यामितिक रेखाएं बच्चे की जीवन-यात्रा का पथ निर्दिष्ट करती हैं। वक़्त और हालात ही बच्चे के मन, उसके सोचने के ढ़ंग, उसके सपनों की उड़ान, उसके हौसलों की बुनियाद और उसकी कार्य शैली को निर्धारित करने वाले कारक हैं।’
इस पुस्तक में पैंतालीस साहित्यकारों का बचपन प्रकाशित हुआ है। अधिकतर बाल साहित्यकारों ने अपना बचपन याद कर उसे करीने से लिपिबद्ध किया है। सौ से अधिक साहित्यकारों का संस्मरणनुमा, आत्मकथात्मक बचपन पढ़ते-पढ़ते पाठक के समक्ष सायास ही रेखाचित्र उभर जाएंगे, इस पुस्तक को पढ़ते हुए यह कहना जरूरी होगा।नौ पन्नों में रमाशंकर ने अपनी बात रखी है। अपनी बात ही नहीं रखी बल्कि संपादन करते समय वह जिन अनुभवों से गुजरे, साहित्यकारों का लिखा-छपा कहीं भी पढ़ा, उसे उन्होंने अपनी बात में स्थान दिया है।
रमाशंकर जी अपनी बात में लिखते हैं कि बचपन एक दस्तावेज होता है। एक ऐसा दस्तावेज जिसे हर कोई संभाल कर रखना चाहता है। बचपन को संजोजकर रखना हमारी जिमेदारी है। ये हमारे स्वर्णिम अतीत की यादें हमारी पीढ़ियों को प्रोत्साहित करती रहेंगी।अपनी बात में रमाशंक ने गिजूभाई बधेका का भी उल्लेख किया है। वह अपनी बात लिखते-लिखते बचपन के अनुभवों की भी बात करते हैं और आज के बच्चों की दुनिया की भी चर्चा करते हैं।अपनी बात में वे बालस्वरूप राही के एक पत्र की चर्चा भी करते हैं।
बालस्वरूप ने रमाशंकर को लिखा-‘‘तुमहारे लिए लेख लिखते हुए मुझे भी अपना गुजरा हुआ जमाना बहुत याद आया। कभी मुसका दिया, कभी आंखों में आंसू आ गये। बड़े से बड़ा आदमी अपने बचपन को कहां भूल पाता है।’’बाल साहित्य के पुरोधा प्रकाश मनु के पत्र का भी उल्लेख मन की बात में किया गया है।
प्रकाश मनु लिखते हैं-‘‘बाल साहित्य का संबंध बचपन से है और बचपन के बारें में सोचते ही मानो एक जादुई दुनिया के द्वार खुल जाते हैं। बचपन बड़े सपने देखने की उमर है, इसीलिए बचपन बड़ी संभावनाओं का नाम है। हमारा बचपन मानो तय कर देता है कि बड़ै होकर हमें क्या बनना है और क्या कर गुजरना है। इसीलिए सबका बचपन एक जैसा होकर भी बहुत अलग है और इतने आनंदपूर्ण रहस्यों से भरा हुआ कि बचपन की बात छिड़ते ही हम जैसे बहने लगते हैं और समय को कुछ होश ही नहीं रहता।’’
अपनी बात में सुभद्राकुमारी चैहान, महादेवी वर्मा, अमृतलाल नागर, चन्द्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’, शंकर सुल्तानपुरी, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी, देवेन्द्र मेवाड़ी सहित छह और बाल साहित्य में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराने वाले साहित्यकारों की महत्वपूर्ण टिप्पणियां शामिल की गई है।
ये संग्रह न सिर्फ बाल पाठकों के लिए उपयोगी है, बल्कि बाल साहित्य में शोध करने वालों के लिए जरूरी है। यही नहीं पैंतालीस बाल साहित्यकार जिनका बचपन यहां जीवंत हो उठा है वे चवालीस बाल साहित्यकारों का बचपन पढ़ सकेंगे। बाल साहित्य में कल, आज और कल के साहित्यकारों के लिए भी यह विविधता भरे समन्दर में डुबकी लगाने जैसा है।फिलहाल तो मैं इसे पढ़कर कहीं हंस रहा हूं तो कहीं कुछ लिखने का मन हुआ जाता है। कहीं मन बेहद भावुक हुआ जाता है। कहीं मन-मस्तिष्क वहां पहुंच जाता है जहां कभी कल्पना भी न की थी।
साहित्यकारों में सन्तोष कुमार सिंह, डाॅ॰ शेषपाल सिंह ‘शेष’, बलराम अग्रवाल, सुभाष नीरव, डाॅ॰ सुनीता, शुकदेव प्रसाद, घमंडीलाल अग्रवाल, कुसुमलता सिंह, डाॅ॰ अमिताभ शंकर राय चैधरी, डाॅ॰ विमला भण्डारी, रेनू चैहान, भगवती प्रसाद द्विवेदी, रमेशचन्द्र पन्त, क्षमा शर्मा, राकेश चक्र, लायक राम मानव, स्नेह लता, कौशल पाण्डेय, डाॅ॰ दिनेश पाठक ‘शशि’, डाॅ॰ हेमन्त कुमार, राजेश उत्साही, अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’, ओमप्रकाश कश्यप, कमलेश भट्ट कमल, हेमन्त यादव ‘शशि’, संजीव जायसवाल संजय, सुधीर सक्सेना ‘सुधि’, डाॅ॰ जगदीश व्योम, डाॅ॰सुरेन्द्र विक्रम, नीलम राकेश, राजीव सक्सेना, डाॅ॰ दिनेश चमोला ‘शैलेश’, कमलेश पाण्डेय ‘पुष्प’, सुरभि बेहेरा, कल्पना कुलश्रेष्ठ, गुडविन मसीह, श्यामसुन्दर श्रीवास्तव ‘चमन’, डाॅ॰ देशबन्धु शाहजहांपुरी, रमाशंकर, मनोहर चमोली ‘मनु’, डाॅ॰ नागेश पाण्डेय ‘संजय’, डाॅ॰ ज़ाकिर अली रजनीश, डाॅ॰ कामना सिंह, डाॅ॰ मो॰ साजिद खान, डाॅ॰ मो॰ अरशद खान का बचपन का अविस्मरणीय बचपन पढ़ा जा सकता है।
उदाहरणार्थ मैं कुछ अंश यहां दे रहा हूं-
एक-‘स्कूल में लकड़ी का एक बक्सा था जिसमें पुस्तकें रखी रहती थीं। प्रधानाध्यापक उसमेंसे पुस्तकें पढ़ने को दिया करते थे। यही स्कूल की लाइब्रेरी कहलाती थीं।
‘दो-‘बच्चों की पंक्तियों में टाट-पट्टी पर बैठना, लिखने की पट्टी रखना, सूखी खड़िया से गुरुजी के द्वारा हिन्दी की वर्णमाला के कुछ अक्षर लिखवाना और फिर पानी में घुली खड़िया से कलम का प्रयोग करके अक्षरों को लिाना पढ़ाई का प्रारभ था।
‘तीन-‘हस्तलेख इतना गन्दा था कि घर और स्कूल दोनों जगह करीब-करीब रोजाना ही पिटाई होती थी। घर पर पिताजी और चाचाजी कान खींचते थे और स्कूल में अध्यापक।’
चार-‘उन दिनों कहकरा अखबारी कागज पर होता था, काली इंक में एक ही रंग में छपी पांच या छह पैसे की पुस्तक आती थी। जो मास्टर ककहरा पढ़ाते थे, वे अपनी मार के लिए बहुत जाने जाते थे। मैं चित्र देखकर अक्षर तो रट चुका था। मगर चित्रों के बगैर अक्षरों की पहचान दिमाग में बैठ नहीं रही थी।
‘पांच-‘मैंने बाज़ भी पाल था! मैं हाथ पर चमड़े का पट्टा लपेटकर उसे बिठाता था। ज़रा भी चूक हो जाती, तो उसके संगीन नुकीले पंजे कलाई में धंस जाते। वह मेरे पास बहुत दिनों तक रहा। उसे पकड़ने और पालने के सारे हुनर मुझे आज भी याद हैं। पर आज ऐसा लगता है जैसे बचपन में मैंने पक्षियों को परेशान करके पाप किया था।
’छह- मां के पास सोने जाती थी, तो वह मेरे ठंडे हाथों को अपने गरम पेट पर रखती थी जिससे कि वे जल्दी गरम हो जाएं। रात में कई-कई बार कंबल और रज़ाई उढ़ाती थी कि कहीं मुझे ठंड न लग जाए। तब कभी नहीं लगता था कि इसमें मां को कितनी परेशानी हो रही होगी।
हम बच्चों की सुविधा के लिए वह हर सुख कुरबान कर देती थी। बल्कि आज तो कोई इस बात को सुनकर चकित हो सकता है कि मैं इतनी बड़ी उम्र तक मां के पास सोती थी।’चाहता तो था कि पैंतालीस साहित्यकारों को पढ़कर सबके बचपन का कोई यादगार अंश यहां आप सभी के समुख रखूं। लेकिन इसमें समय भी लगेगा और पुस्तक को आप तक पहुंचाने की आतुरता रोके नहीं रुक रही है।
संपादक को छोड़कर आप में से यदि कोई मुझे उपर्युक्त अंशों के रचयिता का नाम बता सकेंगे तो मैं भी प्रसन्न हो जाऊँगा और मुझे पता लगेगा कि आप ने भी पुस्तक पढ़ ली है।बहरहाल तीन सौ चार पृष्ठों की यह पुस्तक बाल साहित्यकारों के लिए किसी ग्रन्थ से कम नहीं है। कागज़ की गुणवत्ता अच्छी है। फोन्ट भी बेहतर है। हार्ड बाउंड में पुस्तक है। मूल्य पुस्तक पर 550 अंकित है।कुल मिलाकर इसे अधिकतर पाठक पढ़ना जरूर चाहेंगे।पुस्तक: अतीत के पन्नों से, साहित्यकारों का बचपन
मूल्य: 550 रुपए
पृष्ठ: 304
आकार: डिमाई
संपादन: रमाशंकर
प्रकाशक: लहर प्रकाशन,778,मुट्ठीगंज,इलाहाबाद 211003
॰॰॰-मनोहर चमोली ‘मनु’
मेल-chamoli123456789@gmail.com
मोबाइल-09412158688

1 टिप्पणी:

यहाँ तक आएँ हैं तो दो शब्द लिख भी दीजिएगा। क्या पता आपके दो शब्द मेरे लिए प्रकाश पुंज बने। क्या पता आपकी सलाह मुझे सही राह दिखाए. मेरा लिखना और आप से जुड़ना सार्थक हो जाए। आभार! मित्रों धन्यवाद।